March 30, 2007

मंगल पांडे नायक नहीं थे...लीला सरुप नायक थीं


मंगल पांडे भारत के पहले स्वतंत्रता संघर्ष 1857 के सैन्य विद्रोह के नायक नहीं थे। द ट्रायल आफ मंगल पांडे पुस्तक की लीला सरूप का कहना है मंगल पांडे नायक नहीं थे। वह एक सिपाही थे। नशे की हालत में उन्होंने अपने साथी सिपाहियों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपने साथ एकजुट होने को कहा, लेकिन कोई भी उनके साथ नहीं गया और वह अकेले रह गए। लीला ने कहा कि उनकी पुस्तक मंगल पांडे के खिलाफ चली सुनवाई से संबंधित सरकारी रिकार्ड और दस्तावेज पर आधारित है। कोलकाता में जन्मी लेखिका ने कहा कि अगर आप सच्चाई जानना चाहते हैं, तो जनवरी 1857 से पूरे रिकार्ड को देखिए। यह आपको सिपाही विद्रोह के समय के हालात के बारे में जानकारी देगा। बहरहाल, उन्होंने यह भी दावा किया कि बरहामपुर की रेजिमेंट के सिपाही वास्तविक नायक थे क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों का आदेश मानने से मना कर दिया था। इसके कारण पूरी रेजिमेंट को भंग कर दिया गया था। थोड़े दिन बाद लीला जी की कुछ किताबें और आएंगी जिनमें लिखा होगा कि पुराना रिकॉर्ड देखिए कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने आतंककारी बताया था। उस समय अंग्रेज ही रिकॉर्ड लिखते थे, सो कुछ भी लिख सकते थे। शायद राष्‍ट्रपिता तक को कुछ और बता दिया जाए जो रिकॉर्ड लीला जी के हाथ लगे उसमें।

7 comments:

अतुल शर्मा said...

ईश्वर इन्हें सद्‍बुद्धि दे।

प्रियंकर said...

ये अनुसंधानकर्ता नहीं घसखुद्दे हैं जिनका कम्पटीशन 'रैगपिकर्स' से है . और उनके निष्कर्षों का स्रोत भी देखिए - तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के दस्तावेज़ . मानो वो कोई पवित्र वेद-वाक्य हों . उन पर कितना भरोसा किया जाए ? हम सब जानते हैं सरकारी दस्तावेजों की असलियत .

अब एक ओर जहां 'सबाल्टर्न' के अंतर्गत हाशिये की आवाजों के आधार पर इतिहास लिखने की मांग मुखर है वहीं दूसरी ओर लीला सरूप जैसे तथाकथित इतिहासकार अभी तक सरकारी दस्तावेज़ों में सच ढूंढने का प्रयास कर रहे हैं .

dhurvirodhi said...

प्रियंकर जी, इन्हें घसखुद्दे कहना घसखुद्दों अपमान करना हैं. वे तो अपना काम ईमानदारी से करते हैं.

भाड़ में जाने दीजिये इन लीला सरूपों जैसे वेबकूफों को.

Amit said...

थोड़े दिन बाद लीला जी की कुछ किताबें और आएंगी जिनमें लिखा होगा कि पुराना रिकॉर्ड देखिए कई क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने आतंककारी बताया था। उस समय अंग्रेज ही रिकॉर्ड लिखते थे, सो कुछ भी लिख सकते थे। शायद राष्‍ट्रपिता तक को कुछ और बता दिया जाए जो रिकॉर्ड लीला जी के हाथ लगे उसमें।

अब ऐसा है कि दोनों अपनी जगह सही हैं, अंग्रेज़ भी और हम भी। जो हम लोगों के लिए क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी थे, अंग्रेज़ों के लिए वे विद्रोही और आतंकवादी ही थे। नज़रिए का फर्क है और यह होता ही है। स्वतंत्रता सेनानी भारतीयों की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे तो इसलिए उनके लिए वे नायक हुए, अंग्रेज़ों के शासन के खिलाफ़ थे इसलिए उनके लिए विद्रोही हुए।

संजय बेंगाणी said...

दस्तावेजो में सुभाषचन्द्र बोस भगोड़े अपराधी के रूप में दर्ज थे/है. फिर वाम पंथी उनके बारे में जो महान विचार रखा करते थे/है के लिए माफी मांग चुके है.

तो ऐसे है ऐतिहासिक दस्तावेज. बाकि सभी को अपने अपने विचार कहने का हक है.

Shrish said...

इन लीला सरुप जैसे लेखकों की प्रवृति होती है बेसिरपैर का लिखकर लाइमलाइट में आने की। ये लोग मल्लिका शेरावत और राखी सावंत का साहित्यिक संस्करण हैं जिन्हें अभिनय करना (लिखना) तो आता नहीं बेसिर पैर के विवाद खड़े कर पब्लिसिटी पाना चाहते हैं।

ऊपर से हवाला देते हैं अंग्रेजों के रिकॉर्ड का, प्रियंकर जी के शब्दों में मानो कि वे "वेद-वाक्य" हों। :)

Shrish said...

हे मित्र मैंने ऐसा क्या गलत कह दिया था जो आपने मेरी टिप्पणी ही प्रकाशित नहीं की। खैर कोई बात नहीं चूँकि ब्लॉग आपका है अतः ये आपका विशेषाधिकार है पर कारण बता सकते तो अच्छा होता।