January 3, 2011

राजस्‍थान की 92 फीसदी जनता बनी बंधक

राजस्‍थान की राज्य की आबादी तकरीबन 56473122 है और इस आबादी का सात से आठ फीसदी हिस्‍सा गुर्जर समाज का है। गुर्जर समाज पांच फीसदी आरक्षण चाहता है लेकिन भाजपा सरकार रही हो या मौजूदा कांग्रेस सरकार। वोट लेने के लिए आश्‍वासन सभी ने दिए लेकिन किया धरा कुछ नहीं। सरकारों के बेवकूफ बनाओ इरादे तंग आकर गुर्जर समाज बार बार आंदोलन करता रहता है ताकि पांच फीसदी आरक्षण मिल जाएं लेकिन इस बार राजस्‍थान हाईकोर्ट ने कह दिया कि एक फीसदी से अधिक कुछ नहीं मिल सकता। बस, बात फंस गई, नेता अड़ गए। मनाने, रुठने के कार्यक्रम हुए एवं हो रहे हैं। गुर्जरों को भी साफ साफ बता देना चाहिए आरक्षण मिलेगा या नहीं।


लेकिन अहम बात यह है कि राजस्‍थान की 92-93 फीसदी जनता को परेशान करने का हक गुर्जर समाज को किसने दिया। आम आदमी तंग हो गया है। खाद्य सामग्री की सप्‍लाई लाइन बिगड़ गई है। ट्रेनों, बसों और मालवाहक वाहनों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। बीमार आदमी एक जगह से दूसरी जगह जा नहीं सकता। बसों और हवाई यातायात के भाड़े में जमकर लूट चल रही है और यह बात सरकार को पता है लेकिन मौन बैठी हुई है। किसने हक दिया इस गुर्जर समाज को राजस्‍थान की बहुसंख्‍यक आबादी को परेशान करने एवं बंधक बनाने का। राजस्‍थान सरकार एवं राजस्‍थान हाईकोर्ट को इस दिशा में पहल करनी चाहिए कि आंदोलन करते रहो लेकिन आम आदमी को जरा भी परेशानी नहीं होनी चाहिए। नौकरी में आर‍क्षण के लिए इतना परेशान कर रहे हैं, नौकरी पा गए तो कितना परेशान करेंगे।

गुर्जर इस बात से शायद वाकिफ नहीं है कि जनता खड़ी हो गई तो वे कहीं के न रहेंगे। राजस्‍थान की जनता को इन गुर्जरों से हो रही परेशानी के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए। दूसरी जातियों को इन गुर्जरों को पहले साफ संकेत देना चाहिए कि 24 घंटे में हमारी परेशानियां बंद करों अन्‍यथा जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहो। सरकार को टालमटोल एवं गोल गोल जवाब और बातचीत को बंद कर साफ बताना चाहिए कि क्‍या हो सकता है और क्‍या नहीं। किसी भी समाज को बेवकूफ न बनाएं। हां, अगली बार कांग्रेस राजस्‍थान में सत्ता में नही आना चाहती हो तो इस रवैये को चलने दे।

ताज्जुब होता है कि राजस्‍थान में अभी तक किसी ने भी जनहित याचिका दाखिल नहीं कि 92-93 फीसदी जनता को जो परेशानी हो रही है उस पर सरकार से एक्‍शन लेने को कहा जाए। सोचिए, 7-8 फीसदी जनसंख्‍या ने एक विशाल आबादी को बंधक बनाने और हैरान करने के सिवा किया क्‍या।

December 27, 2009

घोटोलेबाज सुधांशु महाराज की जय हो !

धुरंधर पत्रकार एस एन विनोद जी के नागपुर से प्रकाशित हिंदी अखबार 'दैनिक 1857' में छपे एक विज्ञापन से कोहराम मचा हुआ है। इस विज्ञापन में आचार्य सुधांशु महाराज के कभी नजदीकी रहे महावीर प्रसाद मानसिंघका ने सुधांशु महाराज पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं और उनसे कुल 22 सवाल पूछे हैं। मानसिंघका सुधांशु महाराज को घपलेबाज बाबा मानते हैं। इस विज्ञापन को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

November 17, 2009

हे राम ! कहां जा रहा है यह देश

भारत मेरा देश नहीं है। समस्‍त भारतीय मेरे भाई बहिन नहीं है। मुझे अपने देश से नफरत है क्‍योंकि मैं केवल अपने राज्‍य को ही प्‍यार करता हूं। अपने देश के लोगों के बीच भाषा, जाति, लिंग और दूसरे सभी आधारों पर इसके टुकड़े टुकड़े करवाना और आम आदमी के बीच जंग करवाना मेरा मकसद है। मैं हमेशा प्रयत्‍न करुंगा कि देश की छवि धूमिल हो, केवल मेरे राज्‍य की छवि सुधरे। मैं अपने देश की सारी परंपराएं और इज्‍जत को दुनिया की नजर में मिट्टी में मिलाने की क्षमता को बढ़ाऊंगा और इसके लिए सब कुछ करुंगा। मैं अपने माता पिता, गुरुजनों और बड़ों को उल्‍टे नसीहत दूंगा कि देश गया भाड़ में। केवल अपने राज्‍य से मतलब रखों और दूसरों का यहां जीना हराम कर दो। मैं हर एक का जीना हराम कर दूंगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मैं अपने देश और अपने देशवासियों की इज्‍जत को धूल में मिलाऊंगा। उनकी बेइज्‍जती और बुराई में ही मेरा सुख निहित है।
हे राम! जय महाराष्‍ट्र

November 8, 2009

वंदे मातरम् विरोधी दारुल उलम के लोगों भारत छोड़ो

इस्‍लामिक धर्म संस्‍था दारुल उलम ने हाल में फतवा जारी कर मुस्लिमों से वंदे मातरम् न गाने को कहा है। इस संस्‍था ने योग गुरु बाबा रामदेव के योग शिबिरों में मुस्लिमों को इसलिए जाने से मना किया है कि इन शिबिरों में दिनचर्या की शुरुआत वंदे मातरम् से होती है। वंदे मातरम् पर हाल के फतवे में केंद्रीय गृहमत्री पी चिदम्‍बरम तक को घसीटा गया कि उनकी हाजिरी में यह फतवा जारी किया गया, लेकिन गृहमंत्री के कार्यालय से यह बयान आया कि चिदम्‍बरम की हाजिरी में ऐसा कोई फतवा जारी नहीं हुआ था। यह संस्‍था चाहती क्‍या है?

कल तो यह संस्‍था प्रधानमंत्री को बुलाएगी और कह देगी कि हमने देश का एक और विभाजन करने का प्रस्‍ताव प्रधानमंत्री की हाजिरी में पारित किया था, लाओं एक और टुकड़ा दो। दारुल उलम के नए फतवे का शिवसेना और भाजपा ने परंपरागत रुप से विरोध किया है। लेकिन मैं दारुल उलम के पदाधिकारियों और खासकर फतवा विभाग के उप प्रमुख मुफ्ती अहसान से यह पूछना चाहता हूं कि यदि वे इस देश की इज्‍जत नहीं कर सकते तो पाकिस्‍तान क्‍यों नहीं चले जाते। अथवा किसी ऐसे इस्‍लामिक राष्‍ट्र में जाकर रहे जहां वे अपनी मनमानी कर सकें। लेकिन ये लोग ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे।

असल में राष्‍ट्रविरोधी मुसलमान इस देश के हैं भी नहीं, इब्राहिम लोदी, बाबर, चंगेज खान, मोहम्‍मद गौरी या गजनी कोई भी हो...सभी दूसरे देश की धरती से भारत आए और लूटकर चले गए। यहां शासन किया, हिंदूओं को जबरन मुसलमान बनाया। ऐसे राष्‍ट्रविरोधियों को हिंदुस्‍तान या वंदे मातरम् से प्‍यार क्‍यों होगा। क्‍या मुसलमान अपनी मां की इज्‍जत नहीं करते? जो कह रहे हैं कि हम अल्‍लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना नहीं कर सकते? यदि अपनी सगी मां की इज्‍जत कर सकते हो तो देश भी मां है उसकी इज्‍जत करने में इतराज क्‍या है? इस्‍लाम में कहां लिखा है कि वंदे मारतम् से खुदा नाराज हो जाएगा, वह तुम्‍हें जहन्‍नुम में डाल देगा? बताओं कहां लिखा है। मूर्ख राष्‍ट्रविरोधियों पढ़ो वंदे मातरम् क्‍या कहता है जबकि इसकी तुलना में दूसरे देशों के राष्‍ट्रगीत तो अपने विरोधियों से बदला लेना ही सीखाते हैं जबकि वंदे मातरम् शांति प्रिय राष्‍ट्रगान है।

वंदे मातरम् तो मातृप्रेम का गीत है, लेकिन विश्‍व के अनेक देशों के राष्‍ट्रगीत तो ऐसे हैं जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्‍वयं के देश की प्रजा के स्‍वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। लेकिन हमारी बात अलग है। भारत ने सदैव विश्‍वशांति को प्राथमिकता दी है। देश के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

छोटे छोटे देशों के राष्‍ट्रगीत भी अनेक बार क्रूर और हिंसक होते हैं। इन्‍हें आततायियों और शत्रु को फटकार लगाने के लिए लिखा गया है। छोटे से देश डेनमार्क का उदाहरण लें। डेनमार्क के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है जो राजा क्रिश्‍टीएन के वीरत्‍व को उकसाती है। उनकी तलवार इतनी तेज चलती थी, शत्रु के कलेजे और सिर को एक साथ काट फेंकती थी। मध्‍य अमरीकी देश ग्‍वाटेमाला के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है-किसी आततायी को तेरे चेहरे पर नहीं थूकने दूंगा ! बल्‍गारिया के राष्‍ट्रगीत में भी आहूति की बात कही गई है। बेशुमार योद्धाओं को बहादुरी से मारा है-जनता के पवित्र उद्देश्‍य के लिए। चीन के राष्‍ट्रगीत में खून से सनी एक लाइन है -हमारे मांस और खून का ढ़ेर लगा देंगे-फिर से एक नई महान चीन की दीवार बनाने के लिए....।

अमरीका में मेरीलैंड नामक एक राज्‍य है। इस राज्‍य का भी राज्‍यगीत या राष्‍ट्रगीत है, जो वीरत्‍व से भरा पड़ा है, इसमें शब्‍द हैं कि- बाल्टिमोर की सड़कों पर फैला हुआ है देशभक्‍तों का नुचा हुआ मांस- इसका बदला लेना है साथियों...! इन सभी की तुलना में सुजलां, सुफलां मलयज शीतलाम् अथवा मीठे जल, मीठे फल और ठंडी हवा की धरती जैसे विचारों का विरोध हो रहा है। यह कितना साम्‍प्रदायिक लग रहा है?ब्रिटेन का राष्‍ट्रगीत ‘गॉड सेव द क्विन (या किंग)’ को 19वीं सदी की शुरूआत में स्‍वीकृति मिली। वर्ष 1745 में इसे पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाया गया, लेकिन इसकी रचना किसने की, किसने संगीत दिया इस विषय में जरा अस्‍पष्‍टता है। लेकिन इससे पूर्व जिस गीत ने राष्‍ट्रगीत का दर्जा पाया, वह कैसे भाव व्‍यक्‍त करता है ? रुल ब्रिटानिया, रुल दि वेव्‍ज/ब्रिटंस नेवर शेल बी स्‍लेव्‍ज (देवी ब्रिटानिया राज करेगी, समुद्रों पर राज करेगी, ब्रिटिश कभी गुलाम नहीं बनेंगे) इस गीत में आगे है- तेरे नगर व्‍यापार से चमकेंगे/हरेक किनारे पर तेरी शोभा होगी....।

बेल्जियम का राष्‍ट्रगीत ‘ब्रेबेनकॉन’ था। जिसे एक फ्रेंच कामेडियन ने लिखा था। इस गीत में डच प्रजा के खिलाफ विष उगला गया था। इसके शब्‍दों में तीन बार संशोधन करना पड़ा। वर्ष 1984 में आस्‍ट्रेलिया ने ‘एडवांस आस्‍ट्रेलिया फॉर’ राष्‍ट्रगीत निश्चित किया। रुस का राष्‍ट्रगीत ‘जिन सोवियत स्‍कोगो सोयूजा’ (सोवियत संघ की प्रार्थना) 1944 में स्‍वीकार किया गया और 1814 में अमरीका ने फ्रांसीस स्‍कॉट नामक कवि के ‘स्‍टार स्‍पेंगल्‍ड बेनर’ राष्‍ट्रगीत के रुप में स्‍वीकार किया। इससे पूर्व रुस ने ‘इंटरनेशनल’ को राष्‍ट्रगीत माना था।

इजरायल का राष्‍ट्रगीत ‘हा-निकवा’ केवल इतना ही है। दिल के अंदर गहरे गहरे तक/ यहूदी की आत्‍मा को प्‍यास है/ पूर्व की दिशा/ एक आखं जायोन देख रही है/ अभी हमारी आशाएं बुझी नहीं हैं/ दो हजार वर्ष पुरानी हमारी आशा/ हमारी धरती पर आजाद प्रजा होने की आशा/ जायोन की धरती और येरुश्‍लम...। फ्रांस का राष्‍ट्रगीत ‘लॉ मार्सेस’ विश्‍व के सर्वाधिक प्रसद्धि राष्‍ट्रगीतों में एक है। वर्ष 1792 में फौज के इंजीनियर कैप्‍टन कलोड जोजफ रुज दि लिजले ने अप्रैल महीने की एक रात यह गीत लिखा और इसके बाद इतिहास में हजारों फ्रांसीसियों ने इस गीत के पीछे अपने को शहीद कर दिया। बहुचर्चित इस राष्‍ट्रगीत की दो लाइनें इस प्रकार है अपने ऊपर जुल्‍मगारों का रक्‍तरंजित खंजर लहरहा है। तुम्‍हें सुनाई देता है अपनी भूमि पर से कूच करके आते भयानक सैनिकों की गर्जनाएं..?...साथी नागरिकों ! उठाओं शस्‍त्र, बनाओं सेना/ मार्च ऑन, मार्च ऑन/ दुशमनों के कलुषित रक्‍त से अपनी धरती को गीली कर दो...। फ्रांस के इस राष्‍ट्रगीत की इन दो पक्तिंयों की चर्चा समय असयम फ्रांस और उसके पड़ौसी देशों में होती रहती है। अभी इन दो पक्तियों की बजाय जो नई दो पंक्तियां सुझाई गई है वे थीं स्‍वाधीनता, प्रियतम स्‍वाधीनता/ शत्रु के किले टूट गए हैं/फ्रेंच बना, अहा, क्‍या किस्‍मत है/ अपने ध्‍वज पर गर्व है.../ नागरिकों, साथियों/ हाथ मिलाकर हम मार्च करें/ गाओं, गाते रहो/ कि जिसने अपनी गीत/ सभी तोपों को शांत कर दें..लेकिन फ्रांस की जनता ने इस संशोधन को स्‍वीकार नहीं किया। मूल पंक्तियों मे जो खुन्‍नस थी, जो कुर्बानी भाव था वह इनमें नहीं था। आज भी पुरानी पंक्तियां ज्‍यों की त्‍यों हैं और फ्रांसीसी फौजी टुकडि़यां इन्‍हें गाते गाते कूच करती हैं।

शायद सर्वाधिक विवादास्‍पद राष्‍ट्रगीत जर्मनी का ‘डोईशलैंड युबर एलिस’ है। जर्मनी के कितने ही राज्‍य पूरे गीत को राष्‍ट्रगीत के रुप में मानते थे। हिटलर के जमाने में भी यही राष्‍ट्रगीत था। लेकिन 1952 से जर्मनी ने तय किया कि केवल तीसरा पैरा ही राष्‍ट्रगीत रहेगा। जर्मनी के राष्‍ट्रगीत का पहला पैरा इस प्रकार है जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर/ रक्षा और प्रतिरक्षा की बात आए तब/ कंधे मिलाकर खड़े रहना साथियों/मियुज से मेमेल तक/ एडीज से बेल्‍ट तक/जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर... यह गीत जबरदस्‍त चर्चा का विषय बने यह स्‍वाभाविक है, आज मियुज नदी फ्रांस और बेल्जियम में बहती है। बेल्‍ट डेनमार्क में है और एडीज इटली में है। जर्मनी के इस राष्‍ट्रगीत में पूरे जर्मनी की सीमाओं के विषय में बताया गया है। कितने ही लोगों के अनुसार यह ग्रेटर जर्मनी है और इसमें से उपनिवेशवाद की बू आती है जबकि जर्मनी की ऐसी कोई दूषित भावना नहीं है। जहां फ्रांस में पंक्तियां बदलने की चर्चा होती है, वहां जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं है। केवल जर्मनी ने ही राष्‍ट्रगीत के रुप में अहिंसक तीसरे पैरे को राष्‍ट्रगीत राष्‍ट्रगीत में स्‍वीकार किया है। इटली में भी 1986 में एक आंदोलन हुआ था। वहां राष्‍ट्रगीत जरा कमजोर महसूस किया जा रहा था। जनमत का कहना था कि संगीतज्ञ बर्डी के बजाय तेजतर्रार देशभक्ति वाले का गीत राष्‍ट्रगीत होना चाहिए। राष्‍ट्रगीत चर्चा में आए इससे चिंता नहीं करनी चाहिए।

प्रत्‍येक देश के राष्‍ट्रगीत में स्‍वाभिमान, गर्व होता है, राष्‍ट्रध्‍वज और राष्‍ट्रगीत ही ऐसी प्रेरणा होती है जिसके लिए सारी की सारी पीढि़यां सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर देती हैं। भारत में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों के अंतिम शब्‍द होते थे ‘वंदे मातरम्...!...’

April 27, 2009

आईये, शिव के धनुष का स्वागत करें


मुझे पिनाक नामक भारतीय भाषाई कंप्यूटिंग को समर्पित संस्था की स्थापना की सूचना देते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है. सस्था के पंजीकरण का कार्य जारी है परंतु आज अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर उसकी साइट का शुभारम्भ किया जा रहा है. कृपया “पिनाक” का स्वागत करें।

मैं दो घटनाओं के बारे में बताना चाहूँगा. कुछ माह पहले भारतीय भाषाओं पर एक सम्मेलन हुआ था. हिन्दी की वकालत में बोल रहे वक्ता (नाम लेना अनिवार्य नहीं है) का स्लाइड-शो अंग्रेजी में था. उन्होने यह भी खेद जताया की फलाने-फलाने लेखक पर आज विकिपिडिया में कोई लेख नहीं है. जाहिर है इन सब के लिए सरकार को जिम्मेदार माना गया।

वर्डप्रेस का हिन्दीकरण, जिसको फटाफट निपटा देने का दावा भी किया था, अभियान से मैं भी बहुत जोश से जुड़ा था. मुझे खेद है कि वह काम आज भी लटका पड़ा है।

यह दो घटनाएँ ऐसी है जिन पर विचार करते करते एक ऐसी संस्था की परिकल्पना ने आकार लिया जो न केवल वेब-अनुप्रयोगों का हिन्दी व हमारी अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद करे साथ ही विकि जैसे ज्ञानकोशों को भी भरने का काम भी करे. इसके अलावा आम जनता को इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के उपयोग के संबंध में शिक्षा भी दे।

ऑपन-सोर्स भारतीयों के लिए वरदान साबित होंगे ऐसा मेरा मानना रहा है. ऐसे में इनके विकास पर भी ध्यान देने की जरूरत है. फिलहाल ये सभी कार्य स्वयं-सेवक स्तर पर हो रहे है और हिन्दी भाषी रोजी-रोटी के चक्कर में या फिर जानकारी के अभाव में अथवा तो उदासीनता के चलते ऐसे कामों से जुड़ नहीं पाते/चाहते है।

इसका हल हमें ऐसी संस्था के रूप में मिला जो इन सभी कार्यों के लिए स्वयं सेवकों व विशेषज्ञों की सेवा लेकर उन्हे यथा सम्भव भुगतान करेगी. इसके लिए धन, “जो दे सकते है ऐसे व्यक्तियों” को इनका महत्त्व समझा कर अर्जित किया जाएगा।

स्वयं सेवकों व विशेषज्ञों की सेवा लेने से वेब पर भारतीय भाषाओं के अनुप्रयोगों की उपलब्धता तीव्रता से बढ़ेगी और विकि जैसे ज्ञानकोश पर भी हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में जानकारी को तीव्रता से बढ़ा सकेंगे. हम सबका सपना भी तो यही है।

पिनाक एक पंजीकृत “सोसायटी” है (पंजीकरण की प्रक्रिया जारी है). कोई भी व्यक्ति जिसे इस अभियान के प्रति निष्ठा है इसका सदस्य बन सकता है. सदस्यता शुल्क “स्वैच्छिक” या फिर कहें तो सांकेतिक है. आप इसके बिना भी सदस्य बन सकते है. अन्य जानकारी के लिए पिनाक की साइट देखें।
जोगलिखी-संजय बेंगाणी के ब्‍लॉग से साभार।