September 18, 2007

सरकारी गुंडों ने रोका जगदीप दांगी को हिंदी सम्‍मेलन में जाने से

जगदीप दांगी 8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क अमरीका में 13-15 जुलाई को क्‍यों नहीं भाग ले पाए। पढि़ए यह व्‍यथा जो उन्‍होंने कई लोगों को बताई। इससे साफ पता चलता है कि सरकारी सत्‍ता में बैठे गुंडे कैसे रोकते हैं एक प्रतिभा को। प्रतिभा पलायन के लिए इसी तरह के गुंडे जिम्‍मेदार हैं। है कोई बहरों के देश में सुनने वाला।
दांगी जी के अनुसार : 8वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क अमरीका में 13-15 जुलाई को था. इस सम्मेलन में मुझे अमरीका से आमंत्रण पत्र आया था। भारतीय विद्या भवन न्यूयार्क के कार्यकारी निदेशक डाँ. पी जयरामन की तरफ़ से मुझे 15 जून को आमंत्रण पत्र आया था। इस सम्मेलन के लिए मेरा रजिस्ट्रेशन न्यूयार्क में ही हुआ था। मेरा रजिस्ट्रेशन अनूप भार्गव [(Anoop Bhargava) Member - Organizing Committee Vishwa Hindi Sammelan] ने 26 जून को कराया था और रजिस्ट्रेशन के लगभग पांच हजार रुपए शुल्क भी उन्होंने ही जमा किए। मेरा रजिस्ट्रेशन न. 2105 था। न्यूयार्क लाने ले जाने और वहां ठहरने का पूरा खर्च आर.एन. मेहरोत्रा जी कर रहे थे वह मेरे स्पोनसर थे। मेरे पास सम्मेलन में जाने के लिये आमंत्रण पत्र था, और आर.एन. मेहरोत्रा का कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास ग्वालियर की तरफ़ से स्पोनसर लेटर भी था। मेहरोत्रा कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास ग्वालियर के अधयक्ष हैं।

इन पत्रों के आधार पर मेरा तत्काल पासपोर्ट बन गया था। लेकिन मैं उस सम्मेलन में जा नहीं सका क्योंकि अमरीकी दूतावास ने मेरा वीजा खारिज कर दिया और उसके खारिज होने का मुझे कोई उपयुक्त कारण भी नहीं बताया। मैंने पूछा तो कहा की आफ़िसर आपसे संतुष्‍ट नहीं है सॉरी..सॉरी... मैं समझ गया की यह सब इसलिए हुआ की मेरे पास आईआईआईटीएम का एनओसी लैटर नहीं था।

आईआईआईटीएम ग्वालियर से मैंने एनओसी पत्र भी मांगा था पर मुझे वह पत्र न तो निदेशक डॉ. ओम विकास ने दिया और न ही रजिस्‍ट्रार डी. कुमार ने दिया और मेरा वीजा आखिर खारिज हो गया। Mrs. Madhu Goswami , Deputy Secretary , Hindi at the Ministry of External Affairs को भी न्यूयार्क से अनूप भार्गव, पी. जयरामन,Reenat Sandhu Consul [Education] CGI, New YorkTel: (212) 774 0627Fax: (212) 879 7914E-mail: edu@indiacgny.org, "Ashok" < ashok@indiacgny.org>, आदि कई लोगों ने श्रीमति Madhu Goswami , Deputy Secretary से मुझे वीजा दिलाने को बार बार कहा। मैं भी उनके आफिस में दो दिन चक्कर लगाता रहा पर उनकी निजी सचिव ने मुझे उनसे मिलने तक नहीं दिया।

मुझे ऐसा आभास हो रहा था की यह लोग जानबूझ कर मुझे अमरीका जाने से रोक रहे थे कोई न कोई तो इसके पीछे था। क्‍योंकि अगर मैं वहां जाता तो यह बात जरूर सामने आती की एक लड़के ने हिंदी के लिए जो काम किया है उसी तरह के काम के लिए भारत सरकार ने लगभग 600 करोड़ रुपए खर्च किए और पब्लिक को हिंदी सॉफ्टवेयर के नाम पर कचरा बांट दिया और जगदीप का काम सरकारी काम से हजार गुना अच्छा था उसे दबा दिया गया। इसे भी देखें अंग्रेजी की मुश्किल से मिली हिंदी को मंजिल...

12 comments:

आशीष said...

केन्द्र में किसी की भी सरकार हो, उन्हें हमेशा एसे लोगों को जरूरत पड़ती हैं जो सरकार का तलुवा चाटने में हमेशा तेयार रहें. लेकिन जगदीप दांगी अलग तरह के इन्सान हैं,. जगदीप दांगी साहेब कोई बात नही हैं,,अच्चा हुआ आप वहां नहीं गए वरना अपको और निराशा होती.. सत्ता हमेशा भांडों की ही होती हैं. चाहे वहां मनमोहन सिंह हो या अटल बिहारी

Rajesh Roshan said...

सफ़ेदपोश गुंडे

Jitendra Chaudhary said...

जगदीप जी,
आपने हिन्दी के प्रति को कार्य किया है वो सराहनीय है, भारत सरकार अभी भी आपकी योग्यता और कर्मठता को नही समझ पायी है। खैर सरकारी काम तो ऐसे ही होता है।

रही बात अमरीकी वीजा की, मै नही समझता कि वीजा दिलाने या रिजेक्ट कराने में सरकार का कोई रोल होगा, अमरीकी(सिवाय व्हाइट हाउस के) किसी की नही सुनते। वैसे हिन्दी दिवस का आयोजन एक तरह से दिखावा ही होता है।

आपसे निवेदन है कि आप अपने कार्यो को प्रदर्शित करने के लिए एक अच्छी सी वैबसाइट बनाएं। अच्छा कार्य दुनिया के किसी भी हिस्से मे हो, उसकी पहचान पूरे विश्व मे होनी चाहिए। इन्टरनैट का माध्यम किसी भी हिन्दी सम्मेलन के माध्यम से बड़ा होता है। इसलिए आप निराश ना हो, और अपना हिन्दी समर्पण जारी रखें। हिन्दी चिट्ठाकार आपके कार्यों को समझते है और आपके साथ है।

Sanjeet Tripathi said...

जीतू भाई के कथन से सहमत!

संजय बेंगाणी said...

हिन्दी के नाम पर करोड़ो का धूँआ हुआ है. दांगीजी न जा सके इसका अफसोस जरूर है, मगर उनके कार्य सदा याद रहेंगे. सरकारी काम तो होते ही....

अनूप भार्गव said...

जगदीप जी:
आप जानते ही हैं कि आप के हिन्दी सम्मेलन में न आ पाने से निराश होने वाले लोगों मे से एक मैं भी था । लेकिन अमेरिकन वीज़ा न मिलनें के पीछे भारतीय सरकार के अधिकारियों की 'कौन्सपिरेसी थ्योरी' से मैं सहमत नहीं हूँ । जीतु भाई के कथन में काफ़ी कुछ सत्यता है ।

रति रानी said...

दांगी जी से पूछें - "आप सरकार को दोष देते आए हैं, सरकार से संघर्ष करते आए हैं, फिर सरकारी सम्मेलन में क्यों जा रहे थे?"

रवि गौतम (आगरा) said...

जहाँ तक मैं व्यक्तिगत तौर पर जगदीप जी को जानता हूँ मेरा मानना है कि वह किसी भी अच्छे कार्य के विरूध नहीं हैं चाहे वह शुरुआत किसी निजी अथवा सरकारी संस्थान की ही तरफ़ से क्यों न हों. सरकार से भी उनका केवल कुछ बिंदुओं पर सिद्वाँतिक मतभेद ही प्रतीत होता है न की वह पूरे सरकारी संस्थानों में अविश्वास प्रकट करते दिखाई देते हैं. इसलिये किसी भी जनकल्याणी शुरुआत का हिस्सा बनने के लिये मैं जगदीप जी को व्यक्तिगत तौर पर और समूचे भारतवर्ष की ओर से उनके कार्यों और जनकल्याण हेतु किये गये सार्थक प्रयासों के लिये बधाई देना चाहूँगा न की उनकी अमेरीका जाने के लिये आलोचना.

Udan Tashtari said...

मुझे लग रहा है कि कहीं कोई गलतफहमी हुई है. मैं नहीं कहता कि सरकारी तंत्र अच्छा है मगर इस केस में भारत सरकार का क्या दोष हो सकता है. अमरीकी वीसा में भारत सरकार कुछ नहीं कर सकती.

मैं जीतू भाई और अनूप भार्गव जी की बात से पूर्णतः सहमत हूँ.

आपके कार्य सराहनीय हैं इसमें कोई दो मत नहीं.

Debashish said...

नाराजगी मिल लेने का खतरा उठा कर आज मैं डांगी जी से एक सवाल पूछना चाहता हूं जो काफी दिनों से मन में है। उनकी हिन्दी समाचार पत्रों और चिट्ठों ने हमेशा से उपेक्षित और प्रताड़ित छवि बनाई है, मुझे पहले सहानुभूति थी। उनके उत्पादों के हज़ार विवरण भी सुन चुका हूं, पर देखा नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि हिन्दी के भले के लिये वे इस उत्पाद को हिन्दी नेट समुदाय को क्यों नहीं मुहैया कराते? IIT जैसे शिक्षा संस्थानों को क्यों नहीं देते? मैं मुफ्त देने की भी बात नहीं कर रहा, एक वेबसाईट बनायें और सशुल्क उसे दें, हम लोग प्रचार करेंगे उसका। क्या उत्पाद को छुपाये रखकर उसकी हाईप बनाये रखना गलत नहीं? जंगल में मोर नाचा किसने देखा? अपने उत्पाद को IPR के नाम पर छुपा कर सरकार पर दोषारोपण करते रहने का मुझे औचित्य नहीं समझ आता। सिडैक वगैरह संस्थानों के उत्पाद निहायत घटिया और दोयम ही क्यों न हों कम से कम सरकार ने http://tdil.mit.gov.in/ पर वे मुफ्त मुहैया तो कराये हैं, निःशुल्क सीडी तो बाँटीं। आप का उत्पाद अगर अच्छा है तो प्रयोक्ताओं की राय सुनकर हज़ार कंपनियाँ उसको लेने को तैयार होंगी, अनेकानेक वेबसाईटें व उत्पाद याहू या गूगल खरीद लेते हैं, पर केवल हाईप पर नहीं खरीदते, उपयोगिता सिद्ध होने पर ही लेते हैं। जगदीप आप किस बात से डर कर यह नहीं कर रहे हैं? हम आप पर यकीन किस आधार पर करें? आप हिन्दी के भले की बात क्यों करें अगर आपका निजी हित ही सर्विपरि है और सहानुभूति बना कर ये उत्पाद सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचना ही ध्येय हो?

Jagdeep said...

me: namaskar sir ji
Sent at 12:05 PM on Tuesday
kamal: नमस्‍कार जी
Sent at 12:07 PM on Tuesday
me: Debashish ji ne likha..नाराजगी मिल लेने का खतरा उठा कर आज मैं डांगी जी से एक सवाल पूछना चाहता हूं जो काफी दिनों से मन में है। उनकी हिन्दी समाचार पत्रों और चिट्ठों ने हमेशा से उपेक्षित और प्रताड़ित छवि बनाई है, मुझे पहले सहानुभूति थी। उनके उत्पादों के हज़ार विवरण भी सुन चुका हूं, पर देखा नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि हिन्दी के भले के लिये वे इस उत्पाद को हिन्दी नेट समुदाय को क्यों नहीं मुहैया कराते? IIT जैसे शिक्षा संस्थानों को क्यों नहीं देते? मैं मुफ्त देने की भी बात नहीं कर रहा, एक वेबसाईट बनायें और सशुल्क उसे दें, हम लोग प्रचार करेंगे उसका। क्या उत्पाद को छुपाये रखकर उसकी हाईप बनाये रखना गलत नहीं? जंगल में मोर नाचा किसने देखा? अपने उत्पाद को IPR के नाम पर छुपा कर सरकार पर दोषारोपण करते रहने का मुझे औचित्य नहीं समझ आता। सिडैक वगैरह संस्थानों के उत्पाद निहायत घटिया और दोयम ही क्यों न हों कम से कम सरकार ने http://tdil.mit.gov.in/ पर वे मुफ्त मुहैया तो कराये हैं, निःशुल्क सीडी तो बाँटीं। आप का उत्पाद अगर अच्छा है तो प्रयोक्ताओं की राय सुनकर हज़ार कंपनियाँ उसको लेने को तैयार होंगी, अनेकानेक वेबसाईटें व उत्पाद याहू या गूगल खरीद लेते हैं, पर केवल हाईप पर नहीं खरीदते, उपयोगिता सिद्ध होने पर ही लेते हैं। जगदीप आप किस बात से डर कर यह नहीं कर रहे हैं? हम आप पर यकीन किस आधार पर करें? आप हिन्दी के भले की बात क्यों करें अगर आपका निजी हित ही सर्विपरि है और सहानुभूति बना कर ये उत्पाद सबसे ऊंची बोली लगाने
Sent at 12:11 PM on Tuesday
me: mere software bhi pichhle 2.5 saal se tdil.mit.gov.in par download ke liye maujood hain...
maine apne work ko public se kabhi bhi nahin chhupaaya hai..
kamal: यदि आप अपना जवाब ईमेल कर दें तो मै पोस्‍ट लगा सकता हूं जो बातें देबाशीष्‍ा ने उठाई उनका जवाब जरुरी है
me: digit magazine ne september 2004 main win98/95 aadhaarit software ko CDs mai jaari huaa hai.
2007 april mai digit magazine ne mere do product anuvaadak aur shabdkosh ko bhi jaari kiya hai..
Sent at 12:15 PM on Tuesday
me: digit magazine ke 2007 june ke ank mai mera i-browser++ hindi explorer winxp/98/95 etc. ko to digit ne vishesh taur se software of this month coloumn ke tahat jaari kiyaa hai...
kamal: आप ईमेल कर दीजिए क्‍योंकि इस समय मैं इसे कॉपी नहीं कर सकता क्‍योंकि टीवी पर न्‍यूज चल रही है और मैं व्‍यस्‍त हूं
मैं ईमेल आते ही पोस्‍ट कर दूंगा और यह बात सभी तक पहुंचनी चाहिए
me: ok
dhanyavaad

Anonymous said...

hello,i want to say something. this not the matter of one jagdeep dangi. there are many more. they have natural talent but due to the curruption in india htere talent are useless for india. agar apane piclae dino ka news paper pada ho to apnae A.P.J abul kalam " the ex- president" and renowned scientist speak in a confrence in u.s. stating that " Mai yaha U.S.A mai indian work ko dekh kar khus bhi hoon aur chakit bhi ki indians desh kai bhar itna accha kaam kaisai kar rahe hain.yaha kaam ki pooja hoti hai aur kuach nahi"this the wording of dr. kalam.
ab app log samjh saktae hain ki ye kebal ek jagdeep dangi nahi hai. kai log viidesh bhag jatae hain. indian best talent puri tarah sai harash hokar videsh jata hai aur kamyabi kai jandae gad deta hai. plz. is tarah ki parmpara ko band karo. aur socho ki ab sai hum kaisai talent ko bardad honae sai rokengae