April 4, 2007

हरियाणा के 28 गांवों में क्रिकेट प्रेमियों की खैर नहीं

लगभग 25 साल पहले भारत को विश्व कप में खिताबी जीत दिलाने वाले पूर्व कप्तान कपिल देव के राज्य हरियाणा के 28 गांवों ने इस खेल पर रोक लगाने का फैसला किया है। इन गांवों की पंचायतों ने न सिर्फ क्रिकेट खेलने बल्कि उसकी चर्चा करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध को तोड़ने वाले परिवारों की सात पीढि़यों को सामाजिक दंड भुगतना पड़ेगा।

हरियाणा के जींद जिले में 28 गांवों की सर्वजातीय दाड़न खाप ने इन गांवों में क्रिकेट खेलने और देखने पर तुरंत प्रभाव से पूरी तरह रोक लगा दी है। अब जो भी इन गांवों में क्रिकेट खेलेगा उन पर जुर्माना लगाने के अलावा उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाएगा। पंचायतों ने अपने इस फैसले को सख्ती से लागू कराने और निगरानी रखने के लिए खाप के हर गांव में दो सदस्यीय समिति का भी गठन कर दिया है। पंचायत ने क्रिकेट खेलने पर जिस सामाजिक 'धेला कोड़ी दंड' का प्रावधान किया है, वह सिर्फ एक पीढ़ी को नहीं बल्कि परिवार की सात पीढि़यों को भुगतना पड़ेगा। इसे बाकायदा पंचायत की बही में लिखा जाएगा। पंचायत के इस फैसले के बाद 28 गांवों में क्रिकेट खेलना और देखना पूरी तरह बंद हो गया है। मेरी टिप्‍पणी ठीक ही किया, बच्‍चों को राष्‍ट्रीय खेल हॉकी सीखाना। क्रिकेट में हो सकता है अगली बार हम बरमूडा से भी हार जाएं।

जनता जनार्दन की पीठ ठोकनी चाहि‍ए...

निठारी गांव की एक पांच वर्षीय बच्ची के साथ बलात्‍कार करने वाले अर्जुन को पीट पीटकर मार डालने पर वहां की आम जनता की पीठ ठोकनी चाहिए। यदि जनता ने उसे यह सजा नहीं दी होती तो क्‍या होता, अस्‍पताल की रिपोर्ट बनती, अर्जुन वकील करता और कुछ सजा पाता या बाइज्‍जती बरी हो जाता। लेकिन आम जनता ने बिल्‍कुल सही किया और जो लोग इसे गलत कह रहे हैं उनकी भी सार्वजनिक पिटाई होनी चाहिए। नागपुर में भी गुंडे अक्‍कू को जिस तरह अदालत परिसर में मारा गया, वह सही था। आम जनता यह कदम पूरी तरह दुखी होने के बाद ही उठाती है, पहले नहीं। कानून और प्रशासन जिस तरह लचर पचर हो गया है, उसमें जरुरी है कि आम जनता समूह में कानून अपने हाथ में ले लें। अब तो जनता को यह सोचना चाहि‍ए कि यदि उनके इलाके के पार्षद, विधायक, सांसद उनकी तकलीफों को दूर नहीं करते हैं तो उनकी भी घेराबंदी की जाए और उन्‍हें वापस बुलाने का अधिकार दिया जाए।

April 3, 2007

चरसियों का डॉन है खुन सा

अमरीका के तीन राष्‍ट्रपति सीनियर बुश, बिल क्लिंटन और जूनियर बुश ने अपनी खूब ताकत लगा ली लेकिन वे चरसियों के सरगना को नहीं पकड़ सके। मौजूदा राष्‍ट्रपति जॉर्ज बुश ने भले सद्दाम हुसैन को फांसी तक पहुंचा दिया और ईरान से भिड़ने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन अमरीका के तीन-तीन राष्‍ट्रपति माफिया डॉन जनरल खुन सा का कुछ न बिगाड़ सके। पुणे में पिछले दिनों हुई रेव पार्टी के कुछ फोटो हमने कल अपने ब्‍लॉग पर लगाए थे और अब चरसियों के सरगना पर रिपोर्ट दी जा रही है, जो मेरी 27 मई 1993 को नागपुर से प्रकाशित अखबार लोकमत समाचार में भी छपी थी। यह सरगना अभी भी जिंदा है। आज ब्‍लॉग पर दी जा रही रिपोर्ट में कुछ और चरसियों के फोटो हैं, जो मैंने आज के लिए बचाकर रखे थे।

जनरल खुन सा अंतरराष्‍ट्रीय नशीले ड्रग्‍स बाजार का नंबर वन डॉन है। म्‍यानमार यानी बर्मा में इस नंबर वन डॉन का अड्डा है। म्‍यानमार के अंदरुनी जंगलों से यह डॉन विश्‍व की प्रतिदिन धीमी मौत वाले ड्रग के कारोबार का संचालन कर रहा है। अमरीकी राष्‍ट्रपति चुनाव के समय बिल क्लिंटन ने कहा था कि उनकी सरकार अमरीकी युवा पीढ़ी को ड्रग व्‍यसन से मुक्ति दिलाने के पीछे भारी बजटीय प्रावधान करेगी एवं अंतरराष्‍ट्रीय ड्रग बाजार के सुपरमैनों के रैकेट को तोड़ेगी। वैसे अमरीका की गुप्‍तचर संस्‍थाएं और नार्कोटिक्‍स विभाग भी इस ड्रग रैकेट को वश में करने में विफल रहा है। इसी वजह से पूर्व अमरीकी राष्‍ट्रपति सीनियर बुश और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन मेजर की हिट लिस्‍ट में पनामा के नोरेगिआ और म्‍यानमार के खुन सा के नाम टॉप पर रहे।

खुन सा एक अरबपति है। विश्‍व के प्रमुख माफियाओं, तस्‍करों के साथ वह अपने ‘गोल्‍डन ट्रायंगल’ नामक जंगल से संपर्क में रहता है। अलग-अलग अंतरराष्‍ट्रीय भाषाओं के जानकार खुन सा की फोन डायरी में पांच नंबर हैं और ये पांचों विश्‍व के ड्रग साम्राज्‍य के मुख्‍य संचालक हैं। खुन सा छिपने के लिए जंगलों में नहीं रहता, अपितु गहरे जंगलों में उसकी विशाल जमीन पर दुनिया भर के लिए पर्याप्‍त हेरोइन का उत्‍पादन होता है, प्रक्रिया होती है। इसके अलावा अन्‍य नशीली दवांए तैयार की जाती है। खुन सा यदा-कदा ही दिखाई देता है लेकिन उसके तहत 20 हजार आधुनिक शस्‍त्रधारी मारफाड कमांडो की टुकड़ी है। यह टुकड़ी उत्‍पादन प्रक्रिया या नशीले पदार्थों की जंगल में खेती भी करती है। कई साल पहले जॉन गूनस्‍टोन नामक पत्रकार कड़ी मेहनत और कितनी ही सिफारिशों के बाद खुन सा के साम्राज्‍य में जा पाया।

गूनस्‍टोन ने लिखा कि वास्‍तव में तो खुन सा ने ड्रग विलेन खड़ा किया है। वहां नियमित रुप से सैन्‍य प्रशिक्षण दिया जाता है। छोटा स्‍कूल, अस्‍पताल और प्रार्थना के लिए बौद्ध मठ भी इस साम्राज्‍य में है। खुन सा स्‍वयं भी किसी अरबपति या विश्‍व के प्रमुख सुपर ड्रग मैन की अपेक्षा सुरक्षा अधिकारी ज्‍यादा नजर आता है। गहरे खाकी रंग का पैंट शर्ट और मध्‍यम शरीर वाले खुन सा ने इस क्षेत्र में अपने अड्डे खोल रखे हैं। खुन सा के पास स्‍टेनलैस स्‍टील रंग की टोयोटा कार है। रिमोट कंट्रोल से लेकर अनेक अति आधुनिक सुविधाएं इस डॉन की जेबों में रहती हैं।

म्‍यानमार के उत्‍तर पूर्व में ही मोंग नामक छोटे से गांव में 71 वर्षीय खुन सा का साम्राज्‍य है। इस गांव की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इस माफिया डॉन को आसानी से पकड़ा जाना काफी कठिन है।
अमरीकन ड्रग प्रवर्तन एजेंसी खुन सा को डेविल कहती है। खुन सा का अजीब शौक यह है कि वह जिस रंग की मोटर कार काम में लेता है उसी रंग का घड़ी में पट्टा बांधता है। खुन सा यह व्‍यापार किसलिए करता है। इस सवाल के जवाब में उसका कहना है कि मेरे साथ जुड़े 20 हजार लोगों के सुख के लिए। अगर वे मेरा साथ छोड़ दें तो मैं अपना धंधा बंद करने के लिए तैयार हूं। खुन सा को कागजों पर नहीं पकड़ा जा सकता क्‍योंकि वह अफीम की खेती करता है ऐसा उसके खाते भी बोलते हैं। खुन सा ने इसके लिए एक शर्त रख दी है कि यदि पश्चिम के देश म्‍यानमार को वित्‍तीय राहत एवं अन्‍य मदद दें तो वह यह क्षेत्र छोड़ देगा। खुन सा इस तरह अपनी देशभक्ति जाहिर कर बर्मा के लोगों की सहानुभूति प्राप्‍त कर लेता है। उसके जंगल टाउन में उसकी भारी धाक है। यहां सभी को सवेरे छह बजे उठना और रात में दस बजे अनिवार्य रुप से सोना पड़ता है।

म्‍यानमारवासियों की अपेक्षा जनरल खुन सा के साम्राज्‍य में रहने वाले लोग काफी सुखी है, इसी कारण अब अधिक से अधिक लोग म्‍यानमार सरकार की अपेक्षा खुन सा के साम्राज्‍य की ओर दौड़ रहे हैं। म्‍यानमार सरकार में ऐसी दहशत है कि खुन सा धीरे-धीरे विशाल प्रजा को अपने साथ कर सरकार के विरुद्ध क्रांति कर म्‍यानमार का प्रमुख जनरल बन सकता है जैसा कि पनामा में जनरल नोरेगिआ ने किया था। खुन सा के साम्राज्‍य में रहने वाले लोग स्‍वयं को बर्मीय या म्‍यानमारी न कहकर सान (खुन सा के नाम पर) कहते हैं। खुन सा अफलातून विदेशी दारु भी बनाता है। आश्‍चर्यजनक बात तो यह है कि जंगल टाउन में नियमित रुप से भाषण दिया जाता है कि आप ड्रग के व्‍यसनी बने तो जिंदगी से हाथ धो बैठेंगे। खुन सा के जंगल टाउन में कोई भी ड्रग का सेवन नहीं करता और जो कोई इनका सेवन करने की कोशिश करता है, उसे सजा दी जाती है।

खुन सा के थाईलैंड में अनेक बंगले हैं, जहां उसकी पत्‍नी और बच्‍चे रहते हैं। थाईलैंड में खुन सा को कानूनी प्रवेश की इजाजत नहीं है। उसे पकड़ने पर 21 हजार डॉलर का इनाम घोषित है। खुन सा को यह काफी गलत लगा है। उसकी मात्र 21 हजार डॉलर की कीमत उसे अपमानजनक लगती है। खुन सा कहना है कि शायद थाई सरकार को मेरी कीमत का अनुमान नहीं है।

खुन सा कहता है कि शासकों का काम हमारे साथ सांठगांठ किए बिना नहीं चलता। इसी कारण हमारे जैसों को पकड़ने या साम्राज्‍य को नेस्‍तनाबूद करने की जहमियत कोई नहीं उठा सकता। अगर पकड़ लिए जाए तो भी छोड़ दिया जाता है। खुन सा इसी वजह से कहता है कि वी आर देयर गोल्‍ड माइन, देयर मनी ट्री इफ देयर इज नो। खुन सा के पास दक्षिण पूर्व एशिया में तीन अत्‍यंत अद्यतन रिफाइनरियां हैं जिनमें नशीली दवाओं का प्रोसेस होता है।

पनामा के पदमुक्‍त जनरल नोरेगिआ का कहना था कि खुन सा विश्‍व के किसी भी कार्पोरेट हेड की तुलना में कम महत्‍वपूर्ण नहीं है। वर्ष 1992 जनरल खुन सा के अनुसान अच्‍छा नहीं रहा। उसने 2500 टन अफीम पैदा की। उनका यह उत्‍पादन अमरीका यूरोप की मांग की तुलना में कम है। जबकि व्‍यसनियों की मांग बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। चाइना व्‍हाइट नामक प्‍योर हेरोइन के दाम तो मनमाने वसूले जाते हैं। दस किलो अफीम से एक किलो हेरोइन बनती है।

हेरोइन से मृत्‍यु प्राप्‍त या बर्बाद अमरीकन, यूरोपियन खुन सा को जानते हैं और उसे मास मर्डरर कहते हैं। वह परिवारों और देश को ठंडे कलेजे खत्‍म कर रहा है। खुन सा इसके जवाब में कहता है कि मै तो अफीम की खेती कर 20 हजार से ज्‍यादा लोगों का भरण पोषण कर रहा हूं। अमरीका खुन सा का खून करना चाहता है, लेकिन उसे थाईलैंड या म्‍यानमार सरकार का साथ नहीं मिलता। राजनेताओं के अपने स्‍वार्थ संबंध जुड़े हुए हैं। इस समय तो ऐसी शंका व्‍यक्‍त की जा रही है कि कितने ही यूरोपियन एवं विकसति देश जनरल खुन सा जैसे माफिया डॉन को वित्‍तीय एवं हरसंभव सहायता दे रहे हैं ताकि अमरीका को अंदर ही अंदर खोखला किया जा सके। ये देश जानते हैं कि युद्ध में तो अमरीका को नहीं जीता जा सकता लेकिन उसकी युवा पीढ़ी को नशे के शिकंजे में कसकर उसे औद्योगिक, शैक्षिणक और तकनीकी तौर पर पीछे धकेला जा सकता है।
चरसियों के फोटो के लिए यहां क्लिक करें
http://journalistkamal.blogspot.com/2007/04/blog-post_02.html

April 2, 2007

इन चरसी लौंडे लौंडियों का क्‍या करे देश -फोटो



पुणे में पिछले दिनों हुई रेव पार्टी के कुछ फोटो एक मित्र ने मुझे भेजे। समझ नहीं आ रहा कि क्‍या लिखूं देश के इन चरसी कर्णधारों के बारे में। इसलिए शीर्षक में ही सब कुछ कहने का प्रयास किया है।



































































इस देश में रहना है तो बेटा ही पैदा करना होगा

आज एक खबर पढ़ रहा था कि मिर्जापुर में एक बाप ने बेटे की चाह में अपनी आठ वर्षीय बेटी की बलि दे दी। मिर्जापुर के समीप बबुराकलां गांव में एक अंधविश्‍वासी पिता राजमणि ने बेटा पाने के लिए अपनी इकलौती बेटी रिंकी जो आठ वर्ष की थी, गर्दन धड़ से अलग कर दी। इस दुष्‍ट बाप को एक ओझा ने बताया कि बेटी की बलि देने पर उसे बेटा प्राप्‍त हो सकेगा। राजमणि, इस बाप का नाम तो नागमणि भी नहीं होना चाहिए, ने अपने घर के आंगन में बेटी को मार डाला। रिंकी की मां शीला ने जब शोर मचाया तो गांव वाले आए और बाप व ओझा को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया।

क्‍या हम हिंदुस्‍तानी कभी नहीं सुधरेंगे। सरकार और समाज अपनी ओर से इस बात का लगातार प्रयास कर रहे हैं कि बेटी भी बेटा ही है, फिर हम सुधरना क्‍यों नहीं चाहते। मैं तो कहता हूं कि बेटे ज्‍यादातर नालायक होते हैं, बेटी ही अपने मां व बाप और परिजनों का बेहतर ख्‍याल रखती है हमेशा। लेकिन शायद ज्‍यादातर लोगों ने यह सोच रखा है कि तुम चाहे जो उखाड़ लो, हम नहीं सुधरेंगे। क्‍या इस राजमणि ने यह नहीं सोचा कि वह बगैर मां के पैदा हो गया था। क्‍या उसकी मां एक नारी नहीं है, क्‍या अकेले बाप ने उसे बगैर स्‍त्री के पैदा कर डाला। मैं तो कहता हूं कि जो लोग केवल बेटे चाहते हो, बेटियां नहीं, उन्‍हें सजा दी जानी चाहिए। इस दुष्‍ट बाप और बेटे ही पैदा करने की राय देने वालों को सरेआम फांसी पर लटकाना चाहिए। आपका क्‍या कहना है, जल्‍दी दीजिए अपनी टिप्‍पणी।