June 15, 2007

वेब पत्रकारिता का बढ़ता मायाजाल


राष्‍ट्रीय पाठक सर्वे 2002 में यह पाया गया था कि भारत में आम आदमी एक अखबार को पढ़ने के लिए मुश्किल से 32 मिनट खर्च करता है, जबकि टेलीविजन देखने के लिए सौ मिनट। युवा पीढ़ी की बात की जाए तो वे अखबार पढ़ने के लिए बेहद कम समय खर्च करते हैं, जबकि टेलीविजन देखने और इंटरनेट सर्फिंग के साथ अधिक समय बिताना पसंद करते हैं। असल में यह स्थिति भारत की नहीं, विदेशों की भी यही है। कंप्‍यूटरों की बढ़ती संख्‍या और ब्राड बैंड के फैलाव से युवा पीढ़ी तो अब टेलीविजन के बजाय इंटरनेट पर अपने दूसरे कार्य मसलन कोई खोज, ईमेल, चैट, पढ़ाई करते हुए समाचारों, विचारों और सूचनाओं के लिए अपने को अपडेट रखने के लिए वेबसाइटों पर ही जाना पसंद करती है।

इंटरनेट के फैलाव के शुरूआती दौर में प्रिंट, ब्राडकॉस्‍ट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम के बाद आई वेब पत्रकारिता के भविष्‍य पर ज्‍यादातर विश्‍लेषकों ने जल्‍दबाजी में टिप्‍पणी की थी कि यह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी लेकिन पिछले दस साल से इसका भारत में मायाजाल बढ़ता जा रहा है। हालांकि, वेब पत्रकारिता के शुरूआती समय में इतने उतार चढ़ाव आए कि इसकी स्थिति डांवाडोल होती दिखी, लेकिन एक बात स्‍वीकार करनी होगी कि दस साल तकनीक आधारित किसी नई चीज के लिए पर्याप्‍त नहीं होते। प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन न्‍यूज चैनलों को आज कई साल हो गए, इसलिए ये हमें जमे जमाए लगते हैं, जबकि वेब पत्रकारिता तो अभी शिशु ही है और इसे युवा बनने में समय लगेगा। लेकिन यहां मैं एक बात साफ कर दूं कि वेब समाचार देखने वाले समाचार पत्र पढ़ने वालों की तुलना में अधिक समृद्ध, अधिक अनुभवी और बेहतर शिक्षित एवं जवान हैं।

समूची दुनिया में इंटरनेट उपभोक्‍ताओं की साल दर साल बढ़ती संख्‍या से वेब के माध्‍यम से समाचार और सूचनाएं जानने वालों की संख्‍या और उनके ट्रैफिक में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। वेबसाइटों में समाचार देखने के अलावा ऑडियो और विजुअल का भी बेहतर उपयोग किया जा रहा है, जो रेडियो और टेलीविजन की कमी को भी दूर करता है। एक माध्‍यम में तीनों माध्‍यम प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन का आनंद लिया जा सकता है।

भारत में वेब पत्रकारिता के इतिहास की बात करें तो यह लगभग दस वर्ष पुरानी है। देश में सबसे पहले चेन्‍नई स्थित हिंदू अखबार अपना पहला इंटरनेट संस्‍करण जारी करने वाला समाचार पत्र बना। हिंदू का इंटरनेट संस्‍करण 1995 में आया था। इसके बाद 1998 तक तकरीबन 48 समाचार पत्रों ने अपने इंटरनेट संस्‍करण लांच किए, लेकिन मौजूदा समय में देखें तो लगभग सभी मुख्‍य समाचार पत्रों, समाचार पत्रिकाओं और टेलीविजन चैनलों के नेट संस्‍करण मौजूद हैं। हालांकि, समाचार पत्र और पत्रिकाएं ऑन लाइन न्‍यूज डिलीवरी के खेल में पूरी तरह नहीं छा पाए हैं। बल्कि इन्हें न्‍यूज पोर्टल, न्‍यूज कॉनग्रेटर्स और इंटरनेट कंपनियां जैसे कि एमएसएन, याहू और गुगल का साथ लेना पड़ा है।

वेब पत्रकारिता में इस समय हम बात करें तो जिन अखबारों की वेबसाइट हैं वे ज्‍यादातर वही सामग्री उपयोग में ले रही हैं जो उनके समाचार पत्र में छपता है। चौबीस घंटे समाचारों, विचारों और सूचनाओं को अपडेट करने वालों की संख्‍या काफी कम है और जो अखबार दिन में अपडेशन करते हैं, उनमें समाचारों की संख्‍या कम होती है। या फिर इनमें विशेष स्‍टोरी के बजाय समाचार एजेंसियों से मिले समाचार होते हैं। अधिकतर अखबारों की वेबसाइटों में शायद इस डर से खास समाचारा नहीं डाले जाते होंगे कि कहीं उनके प्रतिस्‍पर्धी समाचार पत्रों के हाथ बेहतर स्‍टोरी न लग जाए या वे भी उन्‍हीं समाचारों को नए रंग रुप में विकसित न कर लें। ये समाचार पत्र मुशिकल से ही अपने इंटरनेट संस्‍करण्‍ा के लिए कुछ नए समाचार, फीचर और फोटोग्राफ तैयार करते हैं। अनेक वेबसाइटों में समाचार, फीचर और सूचनाएं नियमित रुप से अपडेट नहीं होती या काफी देर से होती है। औसत तौर पर देखें तो भी तकरीबन 60 फीसदी सामग्री वेब संस्‍करण में प्रिंट से उठाया हुआ ही होता है। लेकिन कुछ अखबारों ने अब इस निर्भरता को तोड़ने का कार्य शुरू कर दिया है और वेबसाइट एवं प्रिंट संस्‍करण के लिए अलग अलग तरीके से समाचार, फीचर और सूचनाएं तैयार कर रहे हैं। इसकी अगुआई टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने की। वेब पत्रकारिता में अब ई पेपर का आगमन हुआ है और यह एक प्रकाशन के वेब संस्‍करण से पूरी तरह अलग है। ई पेपर एक प्रिंट संस्‍करण जैसा ही दिखता है।

अखबारों के वेब संस्‍करण के संपादकीय विभाग की बात करें तो इंटरनेट संस्‍करण में जब ज्‍यादातर सामग्री प्रिंट से ले ली जाती है तो वहां स्‍टॉफ काफी कम रहता है। लेकिन कुछ मुख्‍यधारओं के समाचार पत्रों मसलन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने अपने ऑनलाइन पेपर की अलग अवधारणा की और उसे प्रिंट संस्‍करण से अलग रखा। इसी तरह हिंदी में वेब दुनिया, प्रभासाक्षी, बीबीसी हिंदी वेबसाइट इसके बेहतर उदाहरण हैं जिनका प्रिंट संस्‍करण से लेना देना नहीं है। जागरण अखबार भी अब याहू के साथ नया पोर्टल लांच करने की तैयारी कर रहा है जो उसके प्रिंट संस्‍करण से अलग होगा। हिंदी में जागरण, प्रभासाक्षी, वेब दुनिया और बीबीसी हिंदी का बोलबाला है। हालांकि, अब समाचार, फीचर अपडेशन में कुछ और वेबसाइट आ रही हैं जो स्‍वतंत्र रुप से वेब आधारित हैं और इनमें स्‍टॉफ भी पर्याप्‍त रखा जा रहा है। समाचार पत्रों में अपने इंटरनेट संस्‍करण के लिए दो या चार लोगों की ही टीम रखी जाती है जो इस नई पत्रकारिता के लिए उचित नहीं है। लेकिन जो संस्‍‍थान पूरी तरह वेब पत्रकारिता में ही हैं, उन्‍होंने कई जगह अपने संवाददाता रखे हैं और बेहतर लेखकों की सेवाएं ले रहे हैं, हालांकि जिस तरह वेब पत्रकारिता का विस्‍तार हो रहा है, उस अनुरुप नए रोजगार के अवसर खड़े नहीं हुए हैं जिसके लिए अभी भी कुछ साल इंतजार करना पड़ेगा।

वेब पत्रकारिता ने पत्रकारिता में बड़ा परिवर्तन किया है। नई तकनीक के आने से वेब पत्रकारिता ने तत्‍काल की एक संस्‍कृति को जन्‍म दिया है। यह एक न्‍यूज एजेंसी या चौबीस घंटे टीवी चैनल जैसी है। तकनीक में हो रहे परिवर्तन ने वेब पत्रकारिता को जोरदार गति दी है। एक वेब पत्रकार जब चाहे वेबसाइट को अपडेट कर सकता है। यहां एक व्‍यक्ति भी सारा काम कर सकता है। प्रिंट में अखबार चौबीस घंटे में एक बार प्रकाशित होगा और टीवी में न्‍यूज का एक रोल चलता रहता है जो अधिकतर रिकॉर्ड होता है जबकि वेब में आप हर सैंकेड नई और ताजा समाचार और सूचनाएं दे सकते हैं जो दूसरे किसी भी माध्‍यम में संभव नहीं है।

मुझे कुछ समाचार बेवसाइटों में मुलाकात करने का मौका मिला है और मैंने वहां देखा कि एक या दो लोग पूरी वेबसाइट चला रहे हैं। इनमें वे लोग जुड़े हुए हैं जो वेब पत्रकारिता में पूरी तरह रम गए हैं और खोज खोजकर समाचारों और फीचरों को अपडेट कर रहे हैं। संपादकीय विभाग के विज्ञापन और मार्केटिंग विभाग में भी लोगों को रोजगार मिल रहा है लेकिन इनमें भी मौजूदा अखबार वाले उसी स्टॉफ का सहारा ले रहे हैं जो उनके अखबारों के लिए विज्ञापन बटोरने या मार्केटिंग का कार्य कर रहे है। लेकिन वेब पूरी तरह अलग तरह का उद्यम मानकर नियुक्तियां करनी होगी तभी इनके विस्‍तार और आय में इजाफा होगा। इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और मानव संसाधन पर बड़ा निवेश करे बगैर इंटरनेट संस्‍करण तैयार किए जा रहे हैं। इसकी एक मुख्‍य वजह इन संस्‍करणों के लाभ में न चलना है लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। और कुछ दूसरे उत्‍पादों, सेवाओं और दूसरी वेबसाइटों के साथ गठबंधन कर आय को बढ़ाया जा रहा है, जिससे लाभ मिलने लगा है।

वेब पत्रकारिता का स्‍वाद और संस्‍कृति प्रिंट पत्रकारिता से अलग ढंग का है। एक वेबसाइट में स्‍थानिक और लौकिक प्रतिरोधक कम होते हैं और ताजा व पुरानी सूचनाएं एक साथ ढूंढी जा सकती है। यानी ऐसी सूचनाएं एक साथ आर्काइवि में मिल सकती है। सूचनाओं को जुटाना, उन्‍हें तैयार करना और प्रसार करना नेट पर ज्‍यादा सरल है। एक न्‍यूज वेबसाइट चलाना एक समाचार पत्र को प्रकाशित करने या एक टीवी चैनल चलाने से ज्‍यादा सस्‍ता और सरल है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकडों पर भरोसा करें तो तो वर्ष 2006 में 390 लाख इंटरनेट उपभोक्‍ता थे जिनकी संख्‍या वर्ष 2007 में बढ़कर एक हजार लाख होने की उम्‍मीद है। साथ ही नेट कनेकटिवीटी में हो रहे सुधार से वेब पत्रकारिता का भविष्‍य बेहतर बनता जा रहा है। यदि हम खोजी पत्रकारिता की भी बात करें तो वेब पत्रकारिता का भी इसमें अच्‍छा योगदान रहा है और किया भी जा रहा है। इसके बेहतर उदारहण तहलका डॉट कॉम और कोबरा डॉट कॉम रहे हैं। कुछ समाचार वेबसाइटों ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए दूसरे स्‍थापित मीडिया संगठनों के साथ गठबंधन किया है। केंद्र सरकार और विभिन्‍न राज्‍य सरकारों के सभी विभागों ने भी सूचनाएं देने के लिए वेबसाइटों का सहारा लिया है हालांकि अनेक सरकारी वेबसाइटों में सूचनाएं समय पर अपडेशन नहीं होती और इनका रखरखाव भी ठीक ढंग से नहीं होता लेकिन पत्रकारों द्धारा सरकार से सूचनाएं नेट के माध्‍यम से जिस तरह मांगी जा रही है उसमें इन सरकारी वेबसाइटों पर अपने कामकाज को सही तरीके से करने का दबाव बढ़ता जा रहा है जो बेहतर है।

वेब पत्रकारिता का एक रुप सिटीजन पत्रकारिता भी है। वेब पत्रकारिता आम आदमी को सूचनाएं, समाचार और अपने विचार दुनिया के सामने रखने का अवसर देती है। कोई भी व्‍यक्ति अपनी वेबसाइट और अब तो ब्‍लॉग बनाकर अपने पास आने वाली सूचनाओं, समाचारों और विचारों को सभी के सामने रख सकता है और यही सिटीजन पत्रकारिता कहलाती है। इस तरह की पत्रकारिता में आप और आपके पाठकों के बीच कोई नहीं होता। सिटीजन पत्रकारिता के तहत समाचार वेबसाइटें आम लोगों से भी समाचार और विचार मंगा सकती हैं। अनेक ई ग्रुप भी समाचारों और विचारों को अपने समूह में लेनदेन करते हैं।

देश में तेजी से बढ़ रहा कंप्‍यूटरीकरण और ब्राड बैंड सेवा वेब पत्रकारिता के विस्‍तार को बढ़ा रहा है। अब इसमें एक और परिवर्तन देखने को मिला है और वह है मोबाइल सेवाओं का विस्‍तार। डेस्‍क टॉप या लैपटॉप न होने की दिशा में मोबाइल पर वेबसाइट खोलकर समाचारों और सूचनाओं को जाना जा सकता है। हालांकि, देश में बिजली की कमी, कंप्‍यूटर की लागत और ब्राड बैंड सेवा/इंटरनेट उपयोग का महंगा शुल्‍क वेब के विस्‍तार में मुख्‍य अड़चन है, लेकिन देश को आर्थिक महासत्‍ता बनाने के लिए बुनियादी सुविधाओं जिसमें बिजली भी शामिल है, को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। उम्‍मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ वर्षों में बिजली की कमी पूरी तरह दूर हो जाएगी। साथ ही ब्राड बैंड सेवा अपने विस्‍तार के साथ सस्‍ती होती जाएगी। इसी तरह कंप्‍यूटरों की लागत को भी पिछले कुछ वर्षों में वाकई कम किया गया है और आज एक लैपटॉप, डेस्‍कटॉप से सस्‍ता हो गया है। लेकिन अभी इसके दाम और नीचे लाने की जरुरत है जिसके प्रयास चल रहे हैं। इन तीन पहलूओं पर यदि तेजी से काम होता है तो समाचार और सूचनाओं का अगला सबसे ताकतवर माध्‍यम वेब पत्रकारिता ही होगा, इसमें अचरज नहीं है। प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम की तुलना में वेब पत्रकारिता बाल्‍यवस्‍था से गुजर रही है, इसे युवा बनने दीजिए फिर यह भी तेजी से दौड़ेगी। आइए स्‍वागत करें वेब पत्रकारिता का।

मीडिया विमर्श का पूरा अंक पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए : http://www.mediavimarsh.com/

May 20, 2007

विश्‍व युद्ध हिंदी ब्‍लॉगरों का

टेलीविजन चैनलों पर आजकल दो कार्यक्रम आ रहे हैं संगीत का प्रथम विश्‍वयद्ध और दूसरा है वॉयस ऑफ इंडिया...दोनों कार्यक्रमों में जमकर संगीत के नए खिलाडि़यों की परीक्षा ली जा रही है और उन्‍हें फिल्‍मो में गाने का मौका दिया जाएगा यदि अंतिम परीक्षा पास कर जाते हैं तो। हम भी चाहते हैं कि कुछ ऐसी ही प्रतियोगिता हिंदी ब्‍लॉगरों के बीच होनी चाहिए जो अलग अलग विषयों पर बेहतर लिखते हों। इनका चयन हिंदी के उम्‍दा लेखकों द्धारा होना चाहिए। सभी ब्‍लॉगर मित्र इस बहस को आगे बढ़ाए कि कैसे यह कार्य हो। चुने गए ब्‍लॉगरों को एक ऐसी वेबसाइट पर साल भर लिखने का मौका मिले, जो हर साल चुने गए बेहतर ब्‍लॉगरों के लिए ही बनी हो। हालांकि यह काम नारद पर बढि़या तरीके से हो सकता है जिसमें बेहतर ब्‍लॉगरों के लेखन के लिए कोई अलग से जगह तय कर दी जाए कि वहां केवल उन्‍हीं की पोस्‍ट होगी। इस कार्यक्रम की कसरत के लिए प्रायोजक से लेकर व्‍यक्तिगत धन योगदान देने वालों की खोज की जा सकती है और यह कठिन कार्य नहीं है। व्‍यक्तिगत योगदान मेरा भी होगा...यह तय है। भाई संजय बेंगानी जी, शशि जी, जीतू जी, मिर्ची सेठ जी, समीर जी उड़न तश्‍तरी, रवि रतलामी जी, फुरसतिया जी, सृजनशिल्‍पी जी, अमिताभ जी, रवीश जी, धुरविरोधी जी, भाटिया जी, ज्ञानदत्‍त पांडेय जी सहित सभी दिग्‍गज जिनके नाम मैं नहीं जानता हूं या इस सूची में छूट गए हैं, वे भी अपने को इस सूची में शामिल कर लें, नाराज न हो.....आप इस बारे में विचार करें और शुरु करे प्रथम विश्‍व युद्ध हिंदी ब्‍लॉगरों का। इस विश्‍व युद्ध में नारद की पूरी टीम के अलावा गुगल, याहू और एमएसएन जैसे सर्च इंजनों में बैठे हिंदी प्रेमियों को भी आमंत्रित किया जाए और जमाया जाए रंग।

May 13, 2007

धंधा खोलो धर्म का


संत आसाराम बापू ट्रस्‍ट का एक मामला हाल में ‘इंडिया टीवी’ पर दिखाया गया जिसमें बताया कि कैसे-कैसे इस संत ने कई जगह करोड़ों रुपए की जमीन फोकट में हड़प ली है और खुद भू माफिया बन गए हैं। मुझे भी कई पत्रकार और गैर पत्रकार मित्रों के फोन आए कि यार इस कलम खिसाई से तो अच्‍छा है संत बन जाएं और मौज करें। मेरा कहना है कि संत क्‍यों बनें, क्‍यों नहीं एक धार्मिक चैनल ही मिलकर खोल लें और ढ़ेर सारा रुपया बनाएं। ‘सहारा समय’ हिंदी साप्‍ताहि‍क में 17 जनवरी 2004 को मेरा एक लेख इसी मसले पर छपा था जिसे जस का तस ब्‍लॉग पर दे रहा हूं।

लेख का शीर्षक था ‘चैनलों की चांदी...’ आप भी पढि़ए...पिछले तीन साल में भारत में धार्मिक चैनल के दर्शकों की संख्‍या में अच्‍छा खासा इजाफा हुआ है। इसे देखते हुए पांच और नए धार्मिक चैनलों के आने की तैयारी हो रही है। धार्मिक चैनलों पर अलग अलग संतों के प्रवचनों का खूब प्रसारण होता है जिनमें मुख्‍य रुप से यह बात होती है कि भगवान कौन है और पैसा मिट्टी है। प्रवचनों का सार यह होता है कि सब कुछ गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।

संतों के सेवक अपने गुरु के ऑडियो-वीडियो टेप तैयार करते हैं और टीवी चैनलों से सौदा तय करते हैं। इसी तरह अलग अलग शहरों में प्रवचनों के आयोजक रहते हैं जो इन गुरुओं के प्रवचन धार्मिक टीवी चैनलों पर प्रसारित कराकर धन लेते हैं। ये प्रवचन पहले से रिकॉर्ड किए हुए भी हो सकते हैं और कई बार इनका सीधा प्रसारण भी कराया जाता है। इन प्रसारणों का लाभ यह होता है कि प्रवचन सुनने वाले भारी संख्‍या में आते हैं और पंडाल हमेशा भरे रहते हैं। आसाराम बापू अपने प्रवचनों का आयोजन खुद करते हैं। अब अन्‍य गुरु भी उनकी राह पर हैं। बड़े संतों के प्रवचन के कार्यक्रम तीन-तीन साल तक के लिए तय रहते हैं। आसाराम बापू के आश्रम की निगरानी रखने वाले अजय शाह बताते हैं कि सत्‍तर के दशक में आसाराम बापू को केवल गुजरात, मध्‍य प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश के कुछ हिस्‍सों में ही जाना जाता था लेकिन 1992 में उन्‍हें अपने प्रवचनों के प्रसारण के लिए सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर सुबह का समय मिला और उनका नाम घर-घर जाना जाने लगा।

नब्‍बे के दशक में सोनी और जी टीवी ने सुबह के समय प्रवचन का प्रसारण शुरू किया और इससे ही धर्म के धंधे में मौजूदा बदलाव आया। लेकिन इस सारे कारोबार को व्‍यवस्थित तौर पर तीन साल पहले आए ‘आस्‍था’ चैनल ने आगे बढ़ाया। देश का यह पहला चैनल है जो धार्मिक प्रवृति वाले लोगों के लिए था। इसके बाद ‘संस्‍कार’ चैनल आया और पिछले साल तीसरा ‘साधना’ चैनल आया। अब ‘जागरण’, ‘शक्ति’, ‘अहिंसा’, ‘संस्‍कृति’ और ‘सुदर्शन’ नाम के चैनल आने की तैयारी कर रहे हैं। इन चैनलों ने नए गुरुओं की कमाई की राह को आसान बनाया है। ‘साधना’ के राकेश गुप्‍ता कहते हैं कि ‘टीवी के आने से गुरुओं को अपनी इमेज खड़ी करने में बड़ी मदद मिली है। अब लोग उन्‍हें खूब जानने लगे हैं और प्रवचन आयोजक भी ज्‍यादा पैसे देने को तैयार हैं।‘

हालांकि कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे धर्म का धंधा कर रहे हैं और माया कमा रहे हैं। ‘आस्‍था’ के मार्केटिंग प्रमुख कमल भक्‍तानी और ‘संस्‍कार’ के दिनेश काबरा धन की बात से इनकार करते हैं। राकेश गुप्‍ता कहते हैं कि उन्‍होंने टीवी चैनल इसलिए किए कि दूसरे दो चैनलों का व्‍यापारीकरण हो चुका था और वे एयर टाइम के लिए धन ले रहे थे। वे कहते हैं, कि ‘केवल हमारा चैनल ही नॉन प्राफिट संगठन है।‘

धार्मिक टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम सुबह सात से नौ बजे तक का होता है और इस दौरान बीस मिनट के प्रवचन के लिए ‘आस्‍था’ और ‘संस्‍कार’ चैनल छह से दस हजार रुपए लेते हैं। नॉन प्राइम टाइम में यह दर लगभग तीन से साढ़े तीन हजार रुपए रहती है। सप्‍ताहांत में दर्शकों की संख्‍या बढ़ जाने से दरें भी बढ़ जाती है और 20 मिनट के लिए 12 हजार से 15 हजार रुपए लिए जाते हैं। ‘साधना’ की दरें कम हैं।

ईसाई मत का प्रसार करने करने वाले चैनल ‘गॉड टीवी’ और ‘जीवन’ हिंदू धार्मिक चैनलों की तरह ही काम कर रहे हैं। ‘गॉड टीवी’ को ब्रिटेन स्थित एंगल फाउंडेशन चलाता है। इस चैनल की आय में 40 फीसदी हिस्‍सेदारी विभिन्‍न चर्चों के कार्यक्रम प्रसारण की है जबकि शेष दान से आती है। दूसरे चैनल ‘जीवन’ को भारत के कैथोलिक चर्च ने प्रमोट किया है जिसका दावा है कि वह नैतिक मूल्‍यों के महत्‍व को समझाते हुए पारिवारिक कार्यक्रम प्रसारित करता है।

धार्मिक चैनलों के लिए प्रवचन और भजनों का प्रसारण मुनाफे का कारोबार है। ‘आस्‍था’ की शुरूआत तीन करोड़ रुपए के मामूली निवेश से हुई थी। प्रसारण उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसे चैनल लांच करना काफी आसान है और दस करोड़ रुपए के बजट में इसकी शुरूआत की जा सकती है। इन चैनलों को चलाने की लागत भी काफी कम बैठती है। ‘आस्‍था’ हर महीने सैटेलाइट के किराए के रुप में छह से सात लाख रुपए अदा करता है। सिंगापुर में ट्रांसमिशन स्‍टेशन चलाने के लिए पांच से छह लाख रुपए देने होते हैं। कर्मचारियों, कार्यालय और स्‍टूडियो पर 15/20 लाख रुपए की लागत बैठती है। इस तरह एक महीने में चैनल का खर्च 30/35 लाख रुपए आता है। इस खर्च के मुकाबले यह चैनल केवल गुरुओं के सहारे हर महीने 50 लाख रुपए कमा लेता है। चैनल की आय में गुरुओं का योगदान 60/70 फीसदी रहता है। विज्ञापन से केवल 20 फीसदी आय होती है। शेष आमदनी भजन एलबम आदि को प्रमोट करने, धार्मिक गतिविधियों को कवर करने और धार्मिक ट्रस्‍टों के प्रोफाइलिंग कारोबार से आती है।

धार्मिक टीवी चैनलों में आम नियम यह है कि छोटे गुरु को बड़े गुरु से ज्‍यादा पैसा अदा करना होता है। यह नियम लिखित नहीं है। इसका गणित इस पर निर्भर है कि छोटे गुरु के प्रवचनों में कितना दम है। अगर वह चैनल के प्रबंधन को जानता हो तो उसे कम पैसा देना पड़ता है। ‘आस्‍था’ चैनल के बीस मिनट के स्‍लॉट में गुरु को तीन मिनट अतिरिक्‍त मिलते हैं। गुरु चाहे तो इस समय को बेचकर विज्ञापनकर्ता से पैसा ले सकता है या फिर अपने उत्‍पादों को प्रमोट करने के लिए इसका उपयोग कर सकता है। मार्केटिंग के जानकार बताते हैं कि गुरुओं ने अपने प्रवचन के प्रायोजक ढूंढकर आय का नया स्‍त्रोत विकसित कर लिया है। ज्‍यादातर गुरु तीनों धार्मिक चैनलों पर आते हैं। लेकिन वे इस बात का खास ख्‍याल रखते हैं कि दो चैनलों पर एक साथ उनका कोई प्रवचन या कार्यक्रम प्रसारित न हो। लाइव प्रसारण के समय उनके सेवक प्रवचनों की रिकॉर्डिंग करते हैं और 20/20 मिनट के कैसेट खुद संपादित कर टीवी चैनलों को सौंपते हैं।

May 11, 2007

सुविधाभोगी संपादकों ने किया है पत्रकारिता का बेड़ा गर्क

शक्तिमान राम को कुशलता के साथ केंवट ने जिस तरह नदी के पार उतारा, वहीं भूमिका मीडिया में एक संपादक की होती है। यहां शक्तिमान समाज है और उसके लिए केवट की भूमिका संपादक को निभानी होती है। लेकिन अब बदले माहौल में संपादकों ने केंवट की भूमिका छोड़ दी है और समाज की बजाय मीडिया मालिकों के हितों के लिए ज्यादा काम कर रहे हैं। पढि़ए मेरा यह पूरा लेख मीडिया विमर्श पत्रिका के इस लिंक पर http://www.mediavimarsh.com/march-may07/kamalsharma.march-may07.htm

May 4, 2007

बंद करो हिंदू, मुस्लिम की लड़ाई ब्‍लॉग वालों

मुंबई की लोकल ट्रेन में एक दिन मैं हमेशा की तरह जा रहा था कि दो लोगों में जगह को लेकर लड़ाई छिड़ गई। इस लड़ाई ने उन दोनों सज्‍जनों या कह लें दुर्जनों ने आदर के साथ भारतीय लहजे में एक दूजे की मां और बहिन तक को याद कर लिया। लड़ाई के हो हल्‍ले से तंग कुछ लोगों ने उन्‍हें चुप रहने को कहा। इसी बीच मेरे पास खड़े एक सज्‍जन जो उस समय भगवान गणेश के भजन गा रहे थे, ने कहा कि क्‍यों लड़ते हो पढ़े लिखे होकर...अरे देखो देश तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है, शेयर बाजार खूब बढ़ रहा है....भारतीय कंपनियां विदेशों में एक के बाद एक कंपनियां खरीदती जा रही है। कुछ सोचो अपने विकास के बारे में...मूर्खों की तरह मत लड़ो। देखो..फलां फलां कंपनियों के शेयरों के दाम इतने दिन में दुगुने हो गए। खैर! अब मैं भी पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं कि हिंदी के ब्‍लॉग लेखक हिंदू, मुस्लिम और ईसाई की लड़ाइयां लड़ रहे हैं। कोई कह रहा है कि फलां ब्‍लॉग वाला मुस्लिमों के लिए लिख रहा है और हिंदू के खिलाफ जहर उगल रहा है। कोई ब्‍लॉग कह रहा है कि हिंदू अच्‍छे हैं और मुस्लिम लड़ाकू। पता नहीं क्‍या क्‍या लिखा जा रहा है जिसका मैं यहां जिक्र नहीं करना चाहता। सभी हिंदी ब्‍लॉग लेखक और पाठक सारी बातें जानते हैं। यह अच्‍छा नहीं हैं कि हम एक दूसरे पर आरोप प्रत्‍यारोप लगाएं और लड़े। लड़ना है तो देश के आर्थिक विकास के लिए लड़ो....समाज की बेहतरी के लिए लड़ो...बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं और शिक्षा के लिए लड़ो। हर जगह सड़क, पानी और बिजली हो, इसके लिए दंगा मचाओ। हमारा देश जब आर्थिक प्रगति की ओर तेजी से बढ़ रहा है तब हमें जाति, धर्म और संप्रदाय के विवाद खड़े करना शोभा नहीं देता। साफ शब्‍दों में कहूं तो बंद करो यह बकवास और बात करो भारत को आर्थिक और राजनीतिक महासत्‍ता बनाने की। देश का हर राज्‍य, हर शहर, हर कस्‍बा और हर गांव कैसे आर्थिक प्रगति में भागीदार बने, इस पर कार्य करो। थाईलैंड के निर्वासित जीवन जी रहे प्रधानमंत्री सिनेवात्रा ने एक बेहतर कार्य किया था वहां एक गांव और एक उत्‍पाद की योजना लागू की जिससे लोगों की माली हालत में सुधार आया। क्‍यों नहीं हम भी एक गांव एक उत्‍पाद जैसी योजनाओं को अपनाकर भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को गति दें। यह मैं मानता हूं कि आपको अपने ब्‍लॉग पर कुछ भी लिखने का अधिकार है लेकिन एक बात बता दूं कि राष्‍ट्र और समाज के विकास के लिए, उसके हित में जो होता है वही लंबे समय चलता है, बकवासबाजी नहीं। जो इससे सहमत नहीं हैं वे यह जान लें कि लोग आज आपके साथ हो सकते हैं लेकिन दीर्घकाल में आपको कोई पढ़ना नहीं चाहेगा। हे मेरे ब्‍लॉग मित्रों सारे वाद विवादों, झगड़ों को दरकिनार कर राष्‍ट्र और समाज के लिए कुछ करें। जिस देश, राष्‍ट्र में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाएं...बचपन में स्‍कूल में गाई जाने वाली प्रार्थना।