August 5, 2014

चलते-चलते...भाग एक

5 अगस्‍त 2014
चलते-चलते...भाग एक

बचपन में लोगों को कहते सुना था कि पैर के तलवे में तिल हो तो आदमी जिंदगी भर एक जगह टिककर नहीं रह सकता यानी हमेशा घूमते फिरते ही रहेगा अथवा भटकते ही रहेगा लेकिन यह सकारात्‍मक रुप से कहा जाता है यानी उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्‍सा घूमने में ही बीत जाएगा। मेरे साथ यही हुआ। छोटेपन से ही सफर ही सफर। रेल का सफर, बस की मुसाफिरी, हवाई यात्राएं। हर साल कई किलोमीटर की यात्रा तो हो ही जाती है। लेकिन अपने यात्रानामा को लिखने की पहली बार सोची। अपनी इस यात्रानाम को नाम दे रहा हूं चलते-चलते।

आज 5 अगस्‍त 2014 को मुंबई से यात्रा शुरु कर रहा हूं आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर की। हालांकि, गुंटूर जाकर ही नहीं आ जाना है, बल्कि वहां से असल यात्रा शुरु होगी। गुंटूर से विजयवाडा, वरंगल, करीमनगर, अदिलाबाद...फिर मध्‍य प्रदेश के छिंदवाडा..जहां से भोपाल, इंदौर, सेधवा, सनावद, धामनोद, खरगौन, खंडवा, बुरहानपुर होते हुए महाराष्‍ट्र के मलकापुर, अकोला, नागपुर, यवतमाल, औरंगाबाद, जलगांव। इन कस्‍बों या शहरों में ही नहीं जाना है बल्कि इनके आसपास के उन गांवों में भी जाना है जहां किसानों ने कपास बोई है। पिछले साल मैं हरियाणा, पंजाब, गुजरात, महाराष्‍ट्र, मध्‍यप्रदेश और आंध्र प्रदेश के उन इलाकों मे गया था जहां कपास की आवक होती है लेकिन मुलाकात हुई थी, कॉटन ब्रोकरों से, जीनिंग-‍स्पिनिंग मिल चलाने वालों से, कपड़ा मिल वालों से। लेकिन इस बार तय किया कि किसानों से सीधे मिला जाए और उनसे कपास फसल का पूरा लेखा जोखा लिया जाए। लोग धर्म तीर्थों की यात्रा करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि इस देश का किसान असली देवता है, जो 125 करोड़ हिंदुस्‍तानियों का पेट पालता है, उनके शरीर कपड़े से ढकता है। इसीलिए हम हिंदुस्‍तानी किसान को अन्‍नदेवता तक कहते हैं।

आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर मैं दिसंबर 2013 में गया भी था जलगांव से महाराष्‍ट्र कवर करते हुए और अब आठ महीने बाद फिर से जा रहा हूं। उस समय गुंटूर संयुक्‍त आंध्र प्रदेश के साथ था लेकिन तेलंगाना राज्‍य के निर्माण के बाद गुंटर पहली बार जाना हो रहा है। गुंटूर असल में लाल मिर्च की एशिया की सबसे बड़ी मंडी है और दुनिया भर की विख्‍यात लाल मिर्च मंडियों में भी इसका अहम स्‍थान है। गुंटूर से समूचे भारत को लाल मिर्च की आपूर्ति नहीं होती बल्कि बांग्‍लादेश, मलेशिया, श्रीलंका, पाकिस्‍तान और चीन भी गुंटूर की लाल मिर्च का स्‍वाद चखते हैं। गुंटूर उड़द और कपास की फसल के लिए भी प्रसिद्ध है लेकिन ज्‍यादातर लोग लाल मिर्च के लिए ही गुंटूर को जानते हैं।

मुंबई से ट्रेन ली मैंने कोणार्क एक्‍सप्रेस ट्रेन नंबर 11019. जो मुंबई से उड़ीसा की राजधानी भुवेनश्‍वर जाती है। मैं कल यानी 6 अगस्‍त 2014 को दोपहर दो बजे के करीब विजयवाड़ा उतर जाऊंगा क्‍योंकि वहां से यह ट्रेन राजामुंदरी होते हुए भुवनेश्‍वर की ओर बढ़ेगी जबकि मैं विजयवाडा से नॉन स्‍टॉप बस से गुंटूर एक से डेढ़ घंटे में पहुंच जाऊंगा। आज जिस बर्थ पर मैं हूं, कल दोपहर बाद उस पर कोई दूसरा यात्री आ जाएगा।  

कोणार्क एक्‍सप्रेस में मुंबई से यह मेरी तीसरी बार यात्रा है। पहली बार जगन्‍नाथपुरी में भगवान जगन्‍नाथ के दर्शन करने, पुरी का समुद्र तट देखने और विख्‍यात कोणार्क मंदिर देख्‍ने के लिए ही इस ट्रेन से सफर तय किया था। दूसरी बार पिछले साल वरंगल इसी ट्रेन से गया और आज फिर विजयवाड़ा तक यह ट्रेन। असल में कोणार्क एक्‍सप्रेस साफ सुथरी और समय पर चलने वाली ट्रेन मानी जाती है और मुझे कोणार्क नाम लुभाता भी है। कोणार्क सूर्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस ट्रेन की कहानी छोड़ मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि कोणार्क के विश्‍व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर में कभी कोई पूजा अर्चना नहीं हुई। जब मैं स्‍वयं पहली बार इस सूर्य मंदिर में गया था तो वहां सूर्य देव के आगे श्रद्धावश हाथ जोड़े एवं इस अदभुत मंदिर को निहारा। अदभुत है यह मंदिर। मंदिर के बाहर बायीं ओर, नवग्रह का मंदिर हैं जहां आकर मैंने पूजा अर्चना की। कोणार्क मंदिर आने वाले इस नवग्रह मंदिर में जरुर जाते हैं।


कोणार्क का सूर्य मंदिर लगभग पूरा बन गया था और कला की दृष्टि से यह अदभुत है और इसे देख्‍ने वाला दांतो तले इसकी कला को देख अंगुली दबा लेता है। इस मंदिर में पूजा अर्चना ना होने की एक वजह रही, प्राण प्रतिष्‍ठा से पहले ही इसका अपवित्र हो जाना। मुख्‍य मंदिर का ऊपरी कलश राजमिस्‍त्री और उनके साथियों से स्‍थापित नहीं हो रहा था। जबकि, राजा का हुक्‍म था कि इसे जल्‍दी स्‍थापित किया जाए अन्‍यथा सजा दी जाएगी। इस बीच, इस राजमिस्‍त्री का बेटा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने अपनी मां से अपने पिता के बारे में पूछा जो उसके जन्‍म पश्‍चात कोणार्क मंदिर को बनाने के‍ लिए घर से जा चुके थे। बेटे ने जिद पकड़ी की वह अपने पिता से मिलने जाएगा लेकिन एक समस्‍या बच्‍चे के सामने यह आई की कि उसके पिता उसे पहचानेंगे कैसे। बेटे ने यह बात अपनी मां को बताई तो मां ने कहा कि घर के पिछवाड़े जो बेर का पेड़ है तु उसके बेर ले जा, तेरे पिता तुझे पहचान लेगे। बेटा बेर लेकर कोणार्क आ गया और पिता-पूत्र का मिलन हुआ। लेकिन अपने पिता को परेशान देख बेटे ने समस्‍या पूछी जब पिता ने बताया कि वे मुख्‍य मंदिर का कलश नहीं बैठा पा रहे हैं तो बेटे ने कहा कि पिताजी आपकी यह समस्‍या दूर हो जाएगी। देर रात बेटे ने मंदिर का कलश बैठा दिया और यह पता नहीं चले कि राजमिस्‍त्री इस काम में विफल रहा, बेटे ने मंदिर के पीछे बह रही नदी में कूदकर अपनी जान दे दी। लेकिन यह बात छिपी नहीं रही और पता चल गई जिसके बाद इस मंदिर को अपवित्र मान लिया गया एवं कोणार्क के इस भव्‍य सूर्य मंदिर में कभी पूजा अर्चना नहीं हुई। चलिए यह तो बात हुई.;कोणार्क मंदिर की। अब कोणार्क एक्‍सप्रेस ने लोनावाला को पार कर लिया है धान  यानी पेडी के छोटे-छोटे खेतों के साथ साथ दौड़ते हुए और ट्रेन में लोनावाला की चिकी, चाय, टमाटो सूप, चाय, कोल्‍डड्रिक बेचने वालों का तांता लग गया है। ऐसा लग रहा है जैसे शाम के समय किसी हाट बाजार में पहुंच गया हूं।---कमल शर्मा

November 8, 2009

वंदे मातरम् विरोधी दारुल उलम के लोगों भारत छोड़ो

इस्‍लामिक धर्म संस्‍था दारुल उलम ने हाल में फतवा जारी कर मुस्लिमों से वंदे मातरम् न गाने को कहा है। इस संस्‍था ने योग गुरु बाबा रामदेव के योग शिबिरों में मुस्लिमों को इसलिए जाने से मना किया है कि इन शिबिरों में दिनचर्या की शुरुआत वंदे मातरम् से होती है। वंदे मातरम् पर हाल के फतवे में केंद्रीय गृहमत्री पी चिदम्‍बरम तक को घसीटा गया कि उनकी हाजिरी में यह फतवा जारी किया गया, लेकिन गृहमंत्री के कार्यालय से यह बयान आया कि चिदम्‍बरम की हाजिरी में ऐसा कोई फतवा जारी नहीं हुआ था। यह संस्‍था चाहती क्‍या है?

कल तो यह संस्‍था प्रधानमंत्री को बुलाएगी और कह देगी कि हमने देश का एक और विभाजन करने का प्रस्‍ताव प्रधानमंत्री की हाजिरी में पारित किया था, लाओं एक और टुकड़ा दो। दारुल उलम के नए फतवे का शिवसेना और भाजपा ने परंपरागत रुप से विरोध किया है। लेकिन मैं दारुल उलम के पदाधिकारियों और खासकर फतवा विभाग के उप प्रमुख मुफ्ती अहसान से यह पूछना चाहता हूं कि यदि वे इस देश की इज्‍जत नहीं कर सकते तो पाकिस्‍तान क्‍यों नहीं चले जाते। अथवा किसी ऐसे इस्‍लामिक राष्‍ट्र में जाकर रहे जहां वे अपनी मनमानी कर सकें। लेकिन ये लोग ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे।

असल में राष्‍ट्रविरोधी मुसलमान इस देश के हैं भी नहीं, इब्राहिम लोदी, बाबर, चंगेज खान, मोहम्‍मद गौरी या गजनी कोई भी हो...सभी दूसरे देश की धरती से भारत आए और लूटकर चले गए। यहां शासन किया, हिंदूओं को जबरन मुसलमान बनाया। ऐसे राष्‍ट्रविरोधियों को हिंदुस्‍तान या वंदे मातरम् से प्‍यार क्‍यों होगा। क्‍या मुसलमान अपनी मां की इज्‍जत नहीं करते? जो कह रहे हैं कि हम अल्‍लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना नहीं कर सकते? यदि अपनी सगी मां की इज्‍जत कर सकते हो तो देश भी मां है उसकी इज्‍जत करने में इतराज क्‍या है? इस्‍लाम में कहां लिखा है कि वंदे मारतम् से खुदा नाराज हो जाएगा, वह तुम्‍हें जहन्‍नुम में डाल देगा? बताओं कहां लिखा है। मूर्ख राष्‍ट्रविरोधियों पढ़ो वंदे मातरम् क्‍या कहता है जबकि इसकी तुलना में दूसरे देशों के राष्‍ट्रगीत तो अपने विरोधियों से बदला लेना ही सीखाते हैं जबकि वंदे मातरम् शांति प्रिय राष्‍ट्रगान है।

वंदे मातरम् तो मातृप्रेम का गीत है, लेकिन विश्‍व के अनेक देशों के राष्‍ट्रगीत तो ऐसे हैं जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्‍वयं के देश की प्रजा के स्‍वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। लेकिन हमारी बात अलग है। भारत ने सदैव विश्‍वशांति को प्राथमिकता दी है। देश के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

छोटे छोटे देशों के राष्‍ट्रगीत भी अनेक बार क्रूर और हिंसक होते हैं। इन्‍हें आततायियों और शत्रु को फटकार लगाने के लिए लिखा गया है। छोटे से देश डेनमार्क का उदाहरण लें। डेनमार्क के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है जो राजा क्रिश्‍टीएन के वीरत्‍व को उकसाती है। उनकी तलवार इतनी तेज चलती थी, शत्रु के कलेजे और सिर को एक साथ काट फेंकती थी। मध्‍य अमरीकी देश ग्‍वाटेमाला के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है-किसी आततायी को तेरे चेहरे पर नहीं थूकने दूंगा ! बल्‍गारिया के राष्‍ट्रगीत में भी आहूति की बात कही गई है। बेशुमार योद्धाओं को बहादुरी से मारा है-जनता के पवित्र उद्देश्‍य के लिए। चीन के राष्‍ट्रगीत में खून से सनी एक लाइन है -हमारे मांस और खून का ढ़ेर लगा देंगे-फिर से एक नई महान चीन की दीवार बनाने के लिए....।

अमरीका में मेरीलैंड नामक एक राज्‍य है। इस राज्‍य का भी राज्‍यगीत या राष्‍ट्रगीत है, जो वीरत्‍व से भरा पड़ा है, इसमें शब्‍द हैं कि- बाल्टिमोर की सड़कों पर फैला हुआ है देशभक्‍तों का नुचा हुआ मांस- इसका बदला लेना है साथियों...! इन सभी की तुलना में सुजलां, सुफलां मलयज शीतलाम् अथवा मीठे जल, मीठे फल और ठंडी हवा की धरती जैसे विचारों का विरोध हो रहा है। यह कितना साम्‍प्रदायिक लग रहा है?ब्रिटेन का राष्‍ट्रगीत ‘गॉड सेव द क्विन (या किंग)’ को 19वीं सदी की शुरूआत में स्‍वीकृति मिली। वर्ष 1745 में इसे पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाया गया, लेकिन इसकी रचना किसने की, किसने संगीत दिया इस विषय में जरा अस्‍पष्‍टता है। लेकिन इससे पूर्व जिस गीत ने राष्‍ट्रगीत का दर्जा पाया, वह कैसे भाव व्‍यक्‍त करता है ? रुल ब्रिटानिया, रुल दि वेव्‍ज/ब्रिटंस नेवर शेल बी स्‍लेव्‍ज (देवी ब्रिटानिया राज करेगी, समुद्रों पर राज करेगी, ब्रिटिश कभी गुलाम नहीं बनेंगे) इस गीत में आगे है- तेरे नगर व्‍यापार से चमकेंगे/हरेक किनारे पर तेरी शोभा होगी....।

बेल्जियम का राष्‍ट्रगीत ‘ब्रेबेनकॉन’ था। जिसे एक फ्रेंच कामेडियन ने लिखा था। इस गीत में डच प्रजा के खिलाफ विष उगला गया था। इसके शब्‍दों में तीन बार संशोधन करना पड़ा। वर्ष 1984 में आस्‍ट्रेलिया ने ‘एडवांस आस्‍ट्रेलिया फॉर’ राष्‍ट्रगीत निश्चित किया। रुस का राष्‍ट्रगीत ‘जिन सोवियत स्‍कोगो सोयूजा’ (सोवियत संघ की प्रार्थना) 1944 में स्‍वीकार किया गया और 1814 में अमरीका ने फ्रांसीस स्‍कॉट नामक कवि के ‘स्‍टार स्‍पेंगल्‍ड बेनर’ राष्‍ट्रगीत के रुप में स्‍वीकार किया। इससे पूर्व रुस ने ‘इंटरनेशनल’ को राष्‍ट्रगीत माना था।

इजरायल का राष्‍ट्रगीत ‘हा-निकवा’ केवल इतना ही है। दिल के अंदर गहरे गहरे तक/ यहूदी की आत्‍मा को प्‍यास है/ पूर्व की दिशा/ एक आखं जायोन देख रही है/ अभी हमारी आशाएं बुझी नहीं हैं/ दो हजार वर्ष पुरानी हमारी आशा/ हमारी धरती पर आजाद प्रजा होने की आशा/ जायोन की धरती और येरुश्‍लम...। फ्रांस का राष्‍ट्रगीत ‘लॉ मार्सेस’ विश्‍व के सर्वाधिक प्रसद्धि राष्‍ट्रगीतों में एक है। वर्ष 1792 में फौज के इंजीनियर कैप्‍टन कलोड जोजफ रुज दि लिजले ने अप्रैल महीने की एक रात यह गीत लिखा और इसके बाद इतिहास में हजारों फ्रांसीसियों ने इस गीत के पीछे अपने को शहीद कर दिया। बहुचर्चित इस राष्‍ट्रगीत की दो लाइनें इस प्रकार है अपने ऊपर जुल्‍मगारों का रक्‍तरंजित खंजर लहरहा है। तुम्‍हें सुनाई देता है अपनी भूमि पर से कूच करके आते भयानक सैनिकों की गर्जनाएं..?...साथी नागरिकों ! उठाओं शस्‍त्र, बनाओं सेना/ मार्च ऑन, मार्च ऑन/ दुशमनों के कलुषित रक्‍त से अपनी धरती को गीली कर दो...। फ्रांस के इस राष्‍ट्रगीत की इन दो पक्तिंयों की चर्चा समय असयम फ्रांस और उसके पड़ौसी देशों में होती रहती है। अभी इन दो पक्तियों की बजाय जो नई दो पंक्तियां सुझाई गई है वे थीं स्‍वाधीनता, प्रियतम स्‍वाधीनता/ शत्रु के किले टूट गए हैं/फ्रेंच बना, अहा, क्‍या किस्‍मत है/ अपने ध्‍वज पर गर्व है.../ नागरिकों, साथियों/ हाथ मिलाकर हम मार्च करें/ गाओं, गाते रहो/ कि जिसने अपनी गीत/ सभी तोपों को शांत कर दें..लेकिन फ्रांस की जनता ने इस संशोधन को स्‍वीकार नहीं किया। मूल पंक्तियों मे जो खुन्‍नस थी, जो कुर्बानी भाव था वह इनमें नहीं था। आज भी पुरानी पंक्तियां ज्‍यों की त्‍यों हैं और फ्रांसीसी फौजी टुकडि़यां इन्‍हें गाते गाते कूच करती हैं।

शायद सर्वाधिक विवादास्‍पद राष्‍ट्रगीत जर्मनी का ‘डोईशलैंड युबर एलिस’ है। जर्मनी के कितने ही राज्‍य पूरे गीत को राष्‍ट्रगीत के रुप में मानते थे। हिटलर के जमाने में भी यही राष्‍ट्रगीत था। लेकिन 1952 से जर्मनी ने तय किया कि केवल तीसरा पैरा ही राष्‍ट्रगीत रहेगा। जर्मनी के राष्‍ट्रगीत का पहला पैरा इस प्रकार है जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर/ रक्षा और प्रतिरक्षा की बात आए तब/ कंधे मिलाकर खड़े रहना साथियों/मियुज से मेमेल तक/ एडीज से बेल्‍ट तक/जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर... यह गीत जबरदस्‍त चर्चा का विषय बने यह स्‍वाभाविक है, आज मियुज नदी फ्रांस और बेल्जियम में बहती है। बेल्‍ट डेनमार्क में है और एडीज इटली में है। जर्मनी के इस राष्‍ट्रगीत में पूरे जर्मनी की सीमाओं के विषय में बताया गया है। कितने ही लोगों के अनुसार यह ग्रेटर जर्मनी है और इसमें से उपनिवेशवाद की बू आती है जबकि जर्मनी की ऐसी कोई दूषित भावना नहीं है। जहां फ्रांस में पंक्तियां बदलने की चर्चा होती है, वहां जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं है। केवल जर्मनी ने ही राष्‍ट्रगीत के रुप में अहिंसक तीसरे पैरे को राष्‍ट्रगीत राष्‍ट्रगीत में स्‍वीकार किया है। इटली में भी 1986 में एक आंदोलन हुआ था। वहां राष्‍ट्रगीत जरा कमजोर महसूस किया जा रहा था। जनमत का कहना था कि संगीतज्ञ बर्डी के बजाय तेजतर्रार देशभक्ति वाले का गीत राष्‍ट्रगीत होना चाहिए। राष्‍ट्रगीत चर्चा में आए इससे चिंता नहीं करनी चाहिए।

प्रत्‍येक देश के राष्‍ट्रगीत में स्‍वाभिमान, गर्व होता है, राष्‍ट्रध्‍वज और राष्‍ट्रगीत ही ऐसी प्रेरणा होती है जिसके लिए सारी की सारी पीढि़यां सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर देती हैं। भारत में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों के अंतिम शब्‍द होते थे ‘वंदे मातरम्...!...’

December 8, 2008

एक वोट ने दिन में दिखा दिए तारे

यदि देश के किसी नेता को यह पूछा जाए कि उसे चुनाव में केवल एक वोट अधिक न मिले तो क्‍या होगा, शायद पहली नजर में वह इसे नजरअंदाज कर दें और कह भी दें कि एक वोट उसे न मिला तो भी चलेगा क्‍योंकि वह बड़े अंतर से जीत का माद्दा रखता है। लेकिन यही बात यदि राजस्‍थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सी पी जोशी से कोई पूछे कि एक वोट की कीमत क्‍या होती है। इस सवाल का जवाब जोशी से बेहतर शायद ही कोई नेता दे पाएगा जिसने उन्‍हें न केवल राज्य का मुख्‍यमंत्री बनने से अटका दिया बल्कि विधानसभा में बैठने से ही रोक दिया। राजसमंद जिले की नाथद्वारा सीट से जोशी चुनाव हार गए हैं। जोशी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शुमार थे। वे काफी दुर्भाग्यशाली रहे। वे केवल एक वोट से चुनाव हारे हैं। जोशी को भाजपा के कल्याण सिंह ने हराया। कल्याण को 62 हजार 216 वोट मिले। जबकि सी पी जोशी को 62 हजार 215 वोट ही मिल पाए। देश के सारे नेता इससे सबक लेंगे कि एक वोट ही उनको दिन में तारे दिखाने के लिए खूब है।

April 15, 2008

तिब्‍बतियों इस कमजोर दलाई लामा को हटाओं, यह तो चीन के साथ है


तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने धमकी दी है कि अगर तिब्बत में हिंसा नहीं थमी, तो वह निर्वासित सरकार के प्रमुख के पद से इस्तीफा दे देंगे। दलाई लामा ने कहा है कि अगर तिब्बत में हिंसा बेकाबू हुई तो मेरे पास इस्तीफा देने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होगा। अगर तिब्बत के ज्यादातर लोग हिंसा चाहते हैं, तो वह अपना पद छोड़ देंगे।

दलाई लामा ने जिस निर्वासित सरकार के प्रमुख पद से इस्‍तीफा देने की बात कही है, वह कैसी सरकार है। यह सरकार चलती कहां हैं। यदि दलाई लामा में जरा भी स्‍वाभिमान और अपने देश के लिए मर मिटने का जज्‍बा होता तो वह आम तिब्‍बतियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे होते। वे इस समय आम तिब्‍बति के साथ नहीं है। उन्‍होंने खुद कह दिया है कि तिब्‍बतियों को चीन के साथ रहना चाहिए। अपने देश का जो गर्व होता है और जो स्‍वाभिमान होता है, वह दलाई लामा में नहीं है।

भारत में शरण लेकर उन्‍होंने दुनिया भर में अपने देश के लिए कोई ढंग से आंदोलन नहीं चलाया और हमेशा दो तरफा बातें करते रहें जिसमें बीच बीच में चीन का जबानी चेतावनी देना उनका खास हथियार रहा। जिस देश, राष्‍ट्र में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाए....ऐसी प्रेरणा उनके खून में नहीं रही। भाग आए भारत और टिक गए धर्मशाला में। अपने देश पर मर मिटना किसी के लिए भी सौभाग्‍य की बात हो सकती है। जो लोग आज तिब्‍बत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं उन्‍हें मैं सलाम करता हूं।

ओलम्पिक मशाल में हमारे फुटबाल खिलाड़ी बायचुंग भूटिया और पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने भाग न लेने का जो फैसला किया वह तारीफ के योग्‍य है। दलाई लामा को इन्‍हीं से कुछ सीख लेना चाहिए। दलाई लामा ने केवल दुनिया घूमने और जगह जगह अपना सम्‍मान कराने एवं पुरस्‍कार लेने के अलावा क्‍या किया। पुरस्‍कार पाने के पुतले बन गए हैं ये दलाई लामा। अपने देशवासियों को कह रहे हैं कि चीन के साथ चुपचाप रहो, अरे उससे आजाद कब कराओगे अपने देश को। यह कैसी वीरता कि चीन के आगे झुक गए दलाई लामा।

दलाई लामा जिसे लोग अपनी आंखों और सिर पर बैठा लेते हैं, साक्षात भगवान का रुप बताते हैं वह तो भगोड़े जैसा व्‍यवहार कर रहे हैं और चीन के साथ देश के विलय को मान चुके हैं। हे, तिब्‍बतवासियों खुद लड़ो अपनी लड़ाई और अपने देश को आजाद कराने की लड़ाई तब तक लड़ना जब तक एक भी तिब्‍बतवासी जिंदा है। छोड दो ऐसे दलाई लामा को। आज चीन ने तिब्‍बत को हड़प लिया और अब भारत के कुछ हिस्‍सों पर कब्‍जा करने की कोशिश करेगा। चीन को रोकना जरुरी है। जिस देश की नीयत में खोट हो वह हमारा भाई नहीं हो सकता। हिंदी चीनी भाई भाई नहीं।

October 11, 2007

फीस के लिए हमबिस्‍तर होती हैं कैंब्रिज स्टूडेंट्स

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की सैकड़ों स्टूडेंट्स बतौर कॉल गर्ल और स्ट्रीपर के रूप में काम कर रही हैं। जानते हैं इसकी वजह क्या है ? यूनिवर्सिटी की फीस और महंगी होती कॉलेज लाइफ। इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट न्यूजपेपर ' वर्सिटी ' में इस बारे एक रिपोर्ट छपी है। 'वर्सिटी' के मुताबिक कैंब्रिज में आजकल अंडरग्रैजुएट लाइफ महंगी हो गई है और खासतौर से उनके लिए जो लग्जरी के साथ जीवन जीना चाहते हैं। न्यूजपेपर में यह भी छपा है कि स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटी की फीस देने के लिए देह बेचने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी की सालना फीस 3.070 पाउंड है।

'वर्सिटी' ने एक स्टूडेंट के हवाले से दावा किया है कि उन्होंने फर्स्ट ईयर वर्किंग का आधा समय कॉल गर्ल के रूप में बिताया। इसके लिए उन्हें हर घंटे 50 पाउंड मिले। वह कहती हैं, 'इस दौरान मैंने जॉब भी किया लेकिन इससे मुझे ज्यादा आमदनी नहीं हो पाई। मैं दूसरी कई स्टूडेंट्स भी मिल चुकी हूं, जो यह काम करती हैं। एक बार जब आप इसे करते हैं, यह लुभाने लगता है। अगर आप बहुत जल्दी और आसानी से पैसा कमाना चाहते हैं, तो आपको यहां से दोनों चीजें मिलेंगी।' वह आगे कहती हैं, मैं एक रात में 1-7 क्लाइंट्स के साथ सोती हूं।

एक दूसरी स्टूडेंट कहती हैं, 'जब मैं स्ट्रीपर के तौर पर काम करती हूं तो मुझे हर डांस के लिए 100 पाउंड तक की रकम मिलती है।' एक दूसरी अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट ने दावा किया कि उन्होंने फर्स्ट ईयर के दौरान 40-50 लोगों से सेक्स संबंध बनाए। उन्होंने कहा, 'इस दौरान मुझे हर हफ्ते 1 हजार पाउंड तक की रकम मिली। मैं 2 महीने के दौरान 40-50 मौकों पर क्लाइंट्स के साथ हमबिस्तर हुई।' कैंब्रिज में इस काम के लिए कई एजेंसियां है। एक घंटे के लिए क्लाइंट से 120 पाउंड चार्ज किया जाता था, जिसमें 50 पाउंड एजेंसी के खाते में चला जाता था और 50 पाउंड मुझे मिलते थे। 20 पाउंड ड्राइवर ले लेता था।

वह कहती हैं कि मैं एक रात में 1-7 क्लाइंट के साथ हमबिस्तर हुई। क्लाइंट का एज ग्रुप भी अलग-अलग था। सबसे कम उम्र का क्लाइंट 18 साल का था जबकि सबसे अधिक दिन का 80 साल का। वह आगे कहती हैं कि मुझे ट्रिनिटी से भी बुलावा आया था, लेकिन मैं वहां नहीं गई। लड़कियों का मानना है कि यह कॉलेज में भी मुमकिन है, लेकिन व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए।

एक और अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट्स जो स्ट्रीप डांस करने के लिए दूसरे शहरों में जाती हैं, कहती हैं- यह ऐसा पल होता है, जिसे मैं करना नहीं चाहती, लेकिन इससे कैरेक्टर बिल्डप होता है। मुझे अपने किसी जान पहचान वाले के सामने डांस करने मे काफी झिझक होती है। लेकिन सब लोग ऐसा कर रहे हैं। जो भी हो टीचर्स के लिए यह चिंता का विषय है। वे स्टूडेंट्स की हर संभव सहायता की कोशिश कर रहे हैं ताकि स्टूडेंट्स को ऐसा न करना पड़े। नवभारत टाइम्‍स से साभार