August 18, 2014

चलते-चलते...भाग-तीन

18 अगस्‍त 2014
चलते-चलते...भाग-तीन
छिंदवाडा से आज पातालकोट एक्‍सप्रेस से इटारसी और फिर वहां से मध्‍य प्रदेश के दूसरे शहर खंडवा। शाम छह बजे तक खंडवा पहुंच जाऊंगा। खंडवा को लोग किशोर कुमार के गांव के रुप में जानते हैं। खंडवा शहर में 4 अगस्त 1929 को जन्म लेने वाले बॉलीवुड के नायक और गायक किशोर कुमार आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं। यह शहर स्‍वतंत्रता आंदोलन में अहम योगदान देने वाले एवं हिंदी के महान पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी की कर्मस्‍थली रहा है जिनकी अहम रचना पुष्‍प की अभिलाषा जन जन के मन-मस्तिषक में आज भी रची बसी है।

मैंने तीसरी कक्षा में पढ़ी थी पुष्‍प की अभिलाषा और पर्वत की अभिलाषा। बचपन में जब स्‍कूल में कोई मौका होता पुष्‍प की अभिलाषा ही गा देता। यह रचना है ही ऐसी की एक बार यदि आपने पढ़ ली तो दिल में बस जाएगी। आज अधिकांश बच्‍चे गाना गाते रहते हैं, मैं बचपन में पुष्‍प की अभिलाषा गुनगुना लेता था। इसके साथ कई राष्‍ट्रीय लेखकों की दूसरी कविताएं भी जबान पर रहती थी। उस समय टीवी था ही नहीं और रेडियो भी मुश्किल से किसी घर में होता था तो पता ही नहीं चलता था कि फिल्‍मी गाने क्‍या बला है।

पुष्‍प की अभिलाषा
चाह नहीं मैं सुरबाला के, 
गहनों में गूँथा जाऊँ, 
चाह नहीं प्रेमी-माला में, 
बिंध प्यारी को ललचाऊँ, 
चाह नहीं, सम्राटों के शव, 
पर, हे हरि, डाला जाऊँ 
चाह नहीं, देवों के शिर पर, 
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ! 
मुझे तोड़ लेना वनमाली! 
उस पथ पर देना तुम फेंक, 
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने 
जिस पथ जाएँ वीर अनेक।

पर्वत की अभिलाषातू चाहे मुझको हरि, सोने का मढ़ा सुमेरु बनाना मत,
तू चाहे मेरी गोद खोद कर मणि-माणिक प्रकटाना मत,
तू मिट जाने तक भी मुझमें से ज्वालाएँ बरसाना मत,
लावण्य-लाड़िली वन-देवी का लीला क्षेत्र बनाना मत,
जगती-तल का मल धोने को
भू हरी-हरी कर देने को
गंगा-जमुनाएँ बहा सकूँ
यह देना, देर लगाना मत।


माखनलाल चतुर्वेदी जी को सभी दादा के नाम से जानते हैं। इनकी प्रकाशित कृतियां हैं: हिमकिरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूँजे धरा, बीजुरी काजल आँज रही आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियां हैं। कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पाँव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि आपकी प्रसिद्ध गद्यात्मक कृतियां हैं।

खंडवा शहर का प्राचीन नाम खांडववन (खांडव वन) था जो मुगलों और अंग्रेजों के आने से बोलचाल में धीरे धीरे खंडवा हो गया। यह कहा जाता है कि राम के वनवास के समय यहां सीता को प्यास लगी थी एवं राम ने यहां तीर मारकर एक कुआ बना दिया और उस कुए को रामेश्वर कुए के नाम से जाना जाता है जो खंडवा के रामेश्वर नगर में नवचंडी माता मंदिर के पास स्थित है। अतः खंडवा मान्यता अनुसार हजारों वर्ष पुराना है जिसका आधुनिक रूप वर्तमान खंडवा है। 12वीं शताब्दी में यह नगर जैन समुदाय का महत्त्वपूर्ण स्थान था। यहां मिलने वाले अवशेषों से यह सिद्ध होता है, इसके चारों ओर चार विशाल तालाब, नक़्क़ाशीदार स्तंभ और जैन मंदिरों के छज्जे थे।

मुंबई से भोपाल जाने पर खंडवा शहर कई बार आया लेकिन खंडवा जाने का पहला अवसर मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्‍वविद्यालय, भोपाल की ओर से ही मिला। दादा के नाम पर स्‍थापित विश्‍वविद्यालय की ओर से खंडवापीठ में पत्रकारिता के विद्यार्थियों का उनके शोधपत्र पर साक्षात्‍कार करना था। इसके बाद दूसरी बार पिछले दिसंबर में ही खंडवा गया और अब तीसरी बार।

कृषि पैदावार में बात करें तो खंडवा कपास, टिम्‍बर, तिलहन और लाल मिर्च का बड़ा व्‍यापार केंद्र है। लाल मिर्च में एशिया की सबसे बड़ी मंडी आंध्र प्रदेश स्थित गुंटूर है लेकिन मध्‍य प्रदेश के निमाड़़ इलाके के किसान जिस तरह हर साल लाल मिर्च की पैदावार बढ़ा रहे हैं, उससे लगता है कि आने वाले समय में खंडवा शहर गुंटूर को पीछे छोड़ देगा।

खंडवा में मेरे एक अजीज पत्रकार मित्र संजय चौबे जी भी रहते हैं। भाई संजय से पहली मुलाकात हुई थी हरियाणा के शहर करनाल में। भारतीय जन संचार संस्‍थान (आईआईएमसी) से 1989 में पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद पहली नौकरी मिली थी विश्‍वमानव में। हिंदी का यह दैनिक अखबार कई शहरों से प्रकाशित होता था जिसमें मुझे करनाल भेजा गया। इस अखबार के समूह संपादक थे माधवकांत मिश्रा और स्‍थानीय संपादक थे बरेली के रहने वाले महेन्‍द्र मनुज। यद्यपि इस अखबार में मैं एक महीने ही रहा एवं जयपुर राजस्‍थान पत्रिका में आ गया। लेकिन एक महीने में यहां सभी का इतना स्‍नेह मिला एवं इतने दोस्‍त बने जो आज भी कायम है। इन दोस्‍तों में संजय चौबे जी भी शामिल थे, जो खंडवा के रहने वाले थे। हालांकि, बाद में 1992 में महाराष्‍ट्र के शहर औरंगाबाद से एक अखबार निकला देवगिरी समाचार। जहां मुझे करनाल के अपने सारे पत्रकार मित्रों को इकट्ठा करने का मौका मिला और हम यहां जुटे भी।

संजय चौबे जी को एक सप्‍ताह पहले बता दिया था कि खंडवा आ रहा हूं। उन्‍होंने हमेशा की तरह गर्मजोशी से कहा भैया आइए, आपका स्‍वागत है। अब दो दिन पहले फिर बात हुई तो पूछ लिया कब आ रहे हैं। सोमवार शाम तक पहुंच जाऊंगा और मिलते है शाम में ही। मैंने बहुत बरस पहले हिंदी की एक फिल्‍म देखी थी जो तंत्र मंत्र और होरर आधारित जैसी थी जिसमें एक जगह आता है नागमणि खंडवा के जंगलों में मिलेगी। हालांकि, मैं नागमणि की खोज में खंडवा नहीं जा रहा, मैं जा रहा हूं किसानों से मिलने जिन्‍होंने कपास की बोआई की है, जो हम देशवासियों का तन ढकने के लिए कपास पैदा कर रहे हैं।


August 15, 2014

चलते-चलते..भाग दो

15 अगस्‍त 2014
चलते-चलते...भाग दो
मुंबई से चला 5 अगस्‍त को आंध्र प्रदेश के शहर गुंटूर के लिए। वहां से आंध्र प्रदेश और उससे अलग होकर बने राज्‍य तेलंगाना के वरंगल, करीमनगर, हैदराबाद, अनंतपुर, कर्नूल और अदिलाबाद शहरों एवं इनसे सटे कई गांवों की यात्रा के बाद आज अदिलाबाद से रवाना हुआ महाराष्‍ट्र की उप राजधानी नागपुर के लिए। लेकिन नागपुर में रुकना नहीं है, वहां से सीधे मध्‍य प्र्रदेश के शहर छिंदवाड़ा निकल जाना है। उम्‍मीद है कि शाम सात बजे के करीब छिंदवाडा़ पहुंच जाऊंगा।
नागपुर से 14 जनवरी 1989 को हिंदी का एक अखबार शुरु हुआ था लोकमत समाचार। आज भी यह अखबार अपने क्षेत्र में अहम स्‍थान पर बना हुआ है। इस अखबार की संस्‍थापक टीम का सदस्‍य बनने का गौरव मुझे भी मिला। यहां उस समय संपादक थे एस एन विनोद जी। झारखंड एवं बिहार के प्रमुख हिंदी दैनिक अखबार प्रभात खबर के संस्‍थापक। हालांकि, अब इस अखबार का स्‍वामित्‍व ऊषा मार्टिन समूह के पास है। इस अखबार में जब मैंने ज्‍वाइनिंग की तो अनेक नए दोस्‍त बने, कुछ सीनियर थे लेकिन माहौल बेहद अच्‍छा और अपनापन तो इतना ज्‍यादा कि आज भी यदि इस अखबार के कार्यालय जाएं और पुराने साथी मिलते हैं तो प्रेमभाव जबरदस्‍त। यहां आने पर पुण्‍य प्रसून वाजेपयी, अनिल सिन्‍हा, सलिल सुधाकर, प्रकाश जी, जावेद जी हम साथ रहते थे, साउथ एवेन्‍यू की ओर सेवा सदन अपार्टमेंट में एक बड़ा फ्लैट दिया गया था लोकमत समूह की ओर से। दूसरा फ्लैट कुछ साथियों को मिला था लोकमत भवन के पीछे, जहां कमल पंकज जी, सत्‍येन्‍द्र सिंह एवं एक या दो और साथी रहते थे।
लोकमत समाचार और उसकी संस्‍थापक टीम के बारे में अपने इस यात्रानामा में कुछ समय बाद लिखूंगा लेकिन इस समय जो उल्‍लेख किया है, वह इसलिए कि छिंदवाडा में उस समय के हमारे साथी कमल पंकज इंतजार कर रहे हैं। पंकज जी कुछ साल बाद छिंदवाडा ही जा बसे और संभवत: अब वहीं के हो गए। उनको मैंने फोन किया कि पंकज जी छिंदवाडा आ रहा हूं। पंकज जी ने गर्मजोशी के साथ कहा आइए मोस्‍ट वैलकम। इंतजार करुंगा। आप नागपुर से आ रहे हैं तो अपना समय बताइए, गाड़ी आपको लेने भिजवा देता हूं। आराम से आ जाएंगे। उस समय तो मैंने हां कह दिया लेकिन बाद में तय किया कि आम जन वाहन से खुद ही छिंदवाडा चला जाऊंगा। कल दोपहर पंकज जी का फिर फोन आया कि कब पहुंच रहे हैं। मैंने कहा कि सीधे छिंदवाडा आ जाऊंगा। आप नागपुर कार भिजवाने का कष्‍ट ना करें। उन्‍होंने काफी आग्रह किया लेकिन मैंने कहा कि मैं पहुंच जाऊंगा तब पंकज जी ने कहा जैसी आपकी मर्जी। देश के कई हिस्‍सों में घूमने का काफी मौका मिला मुझे लेकिन छिंदवाडा पहली बार जा रहा हूं। नागपुर रहते हुए भी वहां नहीं गया था। इस बीच, लोकमत समाचार के मेरे प्रिय साथी जीवंत शरण जी से चर्चा हुई कि छिंदवाडा जा रहा हूं लेकिन नागपुर रुकूंगा नहीं, बाद में आता हूं वहां। नागपुर जाना होता है तो रुकने का कार्यक्रम भी जीवंत जी के घर ही होता है। नागपुर आने का जरा सा जिक्र छिड़ जाएं तो उससे पहले ही जीवंत जी कह देते हैं कि सीधे घर चले आना बेझिझक। और अब तो नागपुर कभी भी जाना हो तो खुद ही पहले फोन उठाते ही जीवंत जी को कह देता हूं घर आ रहा हूं। तब वे कहते हैं आइए ना भाई आपका ही घर है।
जीवंत जी ने बताया कि छिंदवाडा आप अपने आफिस कार्य के अलावा थोड़ा समय पातालकोट देखने के लिए जरुर निकालिएं। क्‍या पता फिर छिंदवाडा जाना हो या ना हो। उन्‍होंने बताया कि हम बचपन में सुना करते थे ना कि जमीन के नीचे पाताल लोक है, जहां बौने बौने लोग रहते हैं, बौने पशु और उससे जुड़ी दादी-मां की कहानियां। पाताल लोक को लेकर कई कहानियां-किस्‍से। बस वही पाताल लोक छिंदवाडा में है। काफी गहराई पर होने से ऊपर से देखने में सब कुछ बौना लगता है और यही है वह जगह। उन्‍होंने बताया कि सबसे पहले कमलनाथ इस जगह गए और तब पता चला कि यह धरती ही है, पाताल नहीं और रहस्‍य खुला कि काफी ऊंचाई से देखने की वजह से सब बौना लगता है, असल में ये आदिवासी लोग है और सब कुछ हमारी तरह का ही है। मैंने अदिलाबाद रेलवे स्‍टेशन पर ट्रेन के आने का इंतजार करते हुए गुगल में पाताल कोट को लेकर खोजा और काफी सामग्री मिली भी। पाताल कोट के बारे में इसी सामग्री से साभार लेकर कुछ बातें आपके लिए भी। उत्‍सुकता तो होती है जब हम पृथ्‍वी लोक के अलावा अन्‍य किसी लोक की चर्चा करते हैं तो..छिंदवाडा से 62 किलोमीटर एवं तामिया विकास खंड से महज 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है पातालकोट। समुद्र सतह से 3250 फुट ऊंचाई पर एवं भूतल से 1000 से 1700 फुट गराई में यह कोट यानि “पातालकोट” स्थित है। हमारे पुरा आख्यानों में “पातालकोट” का जिक्र बार-बार आया है। लंका नरेश रावण का एक भाई, जिसे अहिरावण के नाम से जाना जाता था, के बारे में पढ़ चुके हैं कि वह पाताल में रहता था। राम-रावण युद्ध के समय उसने राम और लक्ष्मण को सोता हुआ उठाकर पाताल लोक ले गया था, और उनकी बलि चढाना चाहता था, ताकि युद्ध हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। इस बात का पता जैसे ही वीर हनुमान को लगता है वे पाताल लोक जा पहुंचते हैं। दोनों के बीच भयंकर युद्ध होता है और अहिरावण मारा जाता है। उसके मारे जाने पर हनुमान उन्हें पुनः युद्धभूमि पर ले आते हैं।
एक खोज के अनुसार पातालकोट की तलहटी में करीब 20 गांव सांस लेते थे, लेकिन प्राकृतिक प्रकोप की वजह से वर्तमान समय में अब केवल 12 गांव ही शेष बचे हैं। एक गांव में 4-5 अथवा सात-आठ से ज्यादा घर नहीं होते। जो बारह गांव हैं, उनके नाम इस प्रकार है-रातेड, चमटीपुर, गुंजाडोंगरी, सहरा, पचगोल, हरकिछार, सूखाभांड, घुरनीमालनी, झिरनपलानी, गैलडुब्बा, घटनलिंग, गुढीछातरी एवं घाना। नागपुर के राजा रघुजी ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से तंग आकर मोर्चा खोल दिया था, लेकिन विपरीत परिस्थितियां देखकर उन्होंने इस गुफ़ा को अपनी शरण-स्थली बनाया था, तभी से इस खोह का नाम “राजाखोह” पडा। राजाखोह के समीप गायनी नदी अपने पूरे वेग के साथ चट्टानों को काटती हुई बहती है।

August 5, 2014

चलते-चलते...भाग एक

5 अगस्‍त 2014
चलते-चलते...भाग एक

बचपन में लोगों को कहते सुना था कि पैर के तलवे में तिल हो तो आदमी जिंदगी भर एक जगह टिककर नहीं रह सकता यानी हमेशा घूमते फिरते ही रहेगा अथवा भटकते ही रहेगा लेकिन यह सकारात्‍मक रुप से कहा जाता है यानी उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्‍सा घूमने में ही बीत जाएगा। मेरे साथ यही हुआ। छोटेपन से ही सफर ही सफर। रेल का सफर, बस की मुसाफिरी, हवाई यात्राएं। हर साल कई किलोमीटर की यात्रा तो हो ही जाती है। लेकिन अपने यात्रानामा को लिखने की पहली बार सोची। अपनी इस यात्रानाम को नाम दे रहा हूं चलते-चलते।

आज 5 अगस्‍त 2014 को मुंबई से यात्रा शुरु कर रहा हूं आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर की। हालांकि, गुंटूर जाकर ही नहीं आ जाना है, बल्कि वहां से असल यात्रा शुरु होगी। गुंटूर से विजयवाडा, वरंगल, करीमनगर, अदिलाबाद...फिर मध्‍य प्रदेश के छिंदवाडा..जहां से भोपाल, इंदौर, सेधवा, सनावद, धामनोद, खरगौन, खंडवा, बुरहानपुर होते हुए महाराष्‍ट्र के मलकापुर, अकोला, नागपुर, यवतमाल, औरंगाबाद, जलगांव। इन कस्‍बों या शहरों में ही नहीं जाना है बल्कि इनके आसपास के उन गांवों में भी जाना है जहां किसानों ने कपास बोई है। पिछले साल मैं हरियाणा, पंजाब, गुजरात, महाराष्‍ट्र, मध्‍यप्रदेश और आंध्र प्रदेश के उन इलाकों मे गया था जहां कपास की आवक होती है लेकिन मुलाकात हुई थी, कॉटन ब्रोकरों से, जीनिंग-‍स्पिनिंग मिल चलाने वालों से, कपड़ा मिल वालों से। लेकिन इस बार तय किया कि किसानों से सीधे मिला जाए और उनसे कपास फसल का पूरा लेखा जोखा लिया जाए। लोग धर्म तीर्थों की यात्रा करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि इस देश का किसान असली देवता है, जो 125 करोड़ हिंदुस्‍तानियों का पेट पालता है, उनके शरीर कपड़े से ढकता है। इसीलिए हम हिंदुस्‍तानी किसान को अन्‍नदेवता तक कहते हैं।

आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर मैं दिसंबर 2013 में गया भी था जलगांव से महाराष्‍ट्र कवर करते हुए और अब आठ महीने बाद फिर से जा रहा हूं। उस समय गुंटूर संयुक्‍त आंध्र प्रदेश के साथ था लेकिन तेलंगाना राज्‍य के निर्माण के बाद गुंटर पहली बार जाना हो रहा है। गुंटूर असल में लाल मिर्च की एशिया की सबसे बड़ी मंडी है और दुनिया भर की विख्‍यात लाल मिर्च मंडियों में भी इसका अहम स्‍थान है। गुंटूर से समूचे भारत को लाल मिर्च की आपूर्ति नहीं होती बल्कि बांग्‍लादेश, मलेशिया, श्रीलंका, पाकिस्‍तान और चीन भी गुंटूर की लाल मिर्च का स्‍वाद चखते हैं। गुंटूर उड़द और कपास की फसल के लिए भी प्रसिद्ध है लेकिन ज्‍यादातर लोग लाल मिर्च के लिए ही गुंटूर को जानते हैं।

मुंबई से ट्रेन ली मैंने कोणार्क एक्‍सप्रेस ट्रेन नंबर 11019. जो मुंबई से उड़ीसा की राजधानी भुवेनश्‍वर जाती है। मैं कल यानी 6 अगस्‍त 2014 को दोपहर दो बजे के करीब विजयवाड़ा उतर जाऊंगा क्‍योंकि वहां से यह ट्रेन राजामुंदरी होते हुए भुवनेश्‍वर की ओर बढ़ेगी जबकि मैं विजयवाडा से नॉन स्‍टॉप बस से गुंटूर एक से डेढ़ घंटे में पहुंच जाऊंगा। आज जिस बर्थ पर मैं हूं, कल दोपहर बाद उस पर कोई दूसरा यात्री आ जाएगा।  

कोणार्क एक्‍सप्रेस में मुंबई से यह मेरी तीसरी बार यात्रा है। पहली बार जगन्‍नाथपुरी में भगवान जगन्‍नाथ के दर्शन करने, पुरी का समुद्र तट देखने और विख्‍यात कोणार्क मंदिर देख्‍ने के लिए ही इस ट्रेन से सफर तय किया था। दूसरी बार पिछले साल वरंगल इसी ट्रेन से गया और आज फिर विजयवाड़ा तक यह ट्रेन। असल में कोणार्क एक्‍सप्रेस साफ सुथरी और समय पर चलने वाली ट्रेन मानी जाती है और मुझे कोणार्क नाम लुभाता भी है। कोणार्क सूर्य मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस ट्रेन की कहानी छोड़ मैं आपको यह बताना चाहूंगा कि कोणार्क के विश्‍व प्रसिद्ध सूर्य मंदिर में कभी कोई पूजा अर्चना नहीं हुई। जब मैं स्‍वयं पहली बार इस सूर्य मंदिर में गया था तो वहां सूर्य देव के आगे श्रद्धावश हाथ जोड़े एवं इस अदभुत मंदिर को निहारा। अदभुत है यह मंदिर। मंदिर के बाहर बायीं ओर, नवग्रह का मंदिर हैं जहां आकर मैंने पूजा अर्चना की। कोणार्क मंदिर आने वाले इस नवग्रह मंदिर में जरुर जाते हैं।


कोणार्क का सूर्य मंदिर लगभग पूरा बन गया था और कला की दृष्टि से यह अदभुत है और इसे देख्‍ने वाला दांतो तले इसकी कला को देख अंगुली दबा लेता है। इस मंदिर में पूजा अर्चना ना होने की एक वजह रही, प्राण प्रतिष्‍ठा से पहले ही इसका अपवित्र हो जाना। मुख्‍य मंदिर का ऊपरी कलश राजमिस्‍त्री और उनके साथियों से स्‍थापित नहीं हो रहा था। जबकि, राजा का हुक्‍म था कि इसे जल्‍दी स्‍थापित किया जाए अन्‍यथा सजा दी जाएगी। इस बीच, इस राजमिस्‍त्री का बेटा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसने अपनी मां से अपने पिता के बारे में पूछा जो उसके जन्‍म पश्‍चात कोणार्क मंदिर को बनाने के‍ लिए घर से जा चुके थे। बेटे ने जिद पकड़ी की वह अपने पिता से मिलने जाएगा लेकिन एक समस्‍या बच्‍चे के सामने यह आई की कि उसके पिता उसे पहचानेंगे कैसे। बेटे ने यह बात अपनी मां को बताई तो मां ने कहा कि घर के पिछवाड़े जो बेर का पेड़ है तु उसके बेर ले जा, तेरे पिता तुझे पहचान लेगे। बेटा बेर लेकर कोणार्क आ गया और पिता-पूत्र का मिलन हुआ। लेकिन अपने पिता को परेशान देख बेटे ने समस्‍या पूछी जब पिता ने बताया कि वे मुख्‍य मंदिर का कलश नहीं बैठा पा रहे हैं तो बेटे ने कहा कि पिताजी आपकी यह समस्‍या दूर हो जाएगी। देर रात बेटे ने मंदिर का कलश बैठा दिया और यह पता नहीं चले कि राजमिस्‍त्री इस काम में विफल रहा, बेटे ने मंदिर के पीछे बह रही नदी में कूदकर अपनी जान दे दी। लेकिन यह बात छिपी नहीं रही और पता चल गई जिसके बाद इस मंदिर को अपवित्र मान लिया गया एवं कोणार्क के इस भव्‍य सूर्य मंदिर में कभी पूजा अर्चना नहीं हुई। चलिए यह तो बात हुई.;कोणार्क मंदिर की। अब कोणार्क एक्‍सप्रेस ने लोनावाला को पार कर लिया है धान  यानी पेडी के छोटे-छोटे खेतों के साथ साथ दौड़ते हुए और ट्रेन में लोनावाला की चिकी, चाय, टमाटो सूप, चाय, कोल्‍डड्रिक बेचने वालों का तांता लग गया है। ऐसा लग रहा है जैसे शाम के समय किसी हाट बाजार में पहुंच गया हूं।---कमल शर्मा

November 8, 2009

वंदे मातरम् विरोधी दारुल उलम के लोगों भारत छोड़ो

इस्‍लामिक धर्म संस्‍था दारुल उलम ने हाल में फतवा जारी कर मुस्लिमों से वंदे मातरम् न गाने को कहा है। इस संस्‍था ने योग गुरु बाबा रामदेव के योग शिबिरों में मुस्लिमों को इसलिए जाने से मना किया है कि इन शिबिरों में दिनचर्या की शुरुआत वंदे मातरम् से होती है। वंदे मातरम् पर हाल के फतवे में केंद्रीय गृहमत्री पी चिदम्‍बरम तक को घसीटा गया कि उनकी हाजिरी में यह फतवा जारी किया गया, लेकिन गृहमंत्री के कार्यालय से यह बयान आया कि चिदम्‍बरम की हाजिरी में ऐसा कोई फतवा जारी नहीं हुआ था। यह संस्‍था चाहती क्‍या है?

कल तो यह संस्‍था प्रधानमंत्री को बुलाएगी और कह देगी कि हमने देश का एक और विभाजन करने का प्रस्‍ताव प्रधानमंत्री की हाजिरी में पारित किया था, लाओं एक और टुकड़ा दो। दारुल उलम के नए फतवे का शिवसेना और भाजपा ने परंपरागत रुप से विरोध किया है। लेकिन मैं दारुल उलम के पदाधिकारियों और खासकर फतवा विभाग के उप प्रमुख मुफ्ती अहसान से यह पूछना चाहता हूं कि यदि वे इस देश की इज्‍जत नहीं कर सकते तो पाकिस्‍तान क्‍यों नहीं चले जाते। अथवा किसी ऐसे इस्‍लामिक राष्‍ट्र में जाकर रहे जहां वे अपनी मनमानी कर सकें। लेकिन ये लोग ऐसा कभी नहीं कर पाएंगे।

असल में राष्‍ट्रविरोधी मुसलमान इस देश के हैं भी नहीं, इब्राहिम लोदी, बाबर, चंगेज खान, मोहम्‍मद गौरी या गजनी कोई भी हो...सभी दूसरे देश की धरती से भारत आए और लूटकर चले गए। यहां शासन किया, हिंदूओं को जबरन मुसलमान बनाया। ऐसे राष्‍ट्रविरोधियों को हिंदुस्‍तान या वंदे मातरम् से प्‍यार क्‍यों होगा। क्‍या मुसलमान अपनी मां की इज्‍जत नहीं करते? जो कह रहे हैं कि हम अल्‍लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना नहीं कर सकते? यदि अपनी सगी मां की इज्‍जत कर सकते हो तो देश भी मां है उसकी इज्‍जत करने में इतराज क्‍या है? इस्‍लाम में कहां लिखा है कि वंदे मारतम् से खुदा नाराज हो जाएगा, वह तुम्‍हें जहन्‍नुम में डाल देगा? बताओं कहां लिखा है। मूर्ख राष्‍ट्रविरोधियों पढ़ो वंदे मातरम् क्‍या कहता है जबकि इसकी तुलना में दूसरे देशों के राष्‍ट्रगीत तो अपने विरोधियों से बदला लेना ही सीखाते हैं जबकि वंदे मातरम् शांति प्रिय राष्‍ट्रगान है।

वंदे मातरम् तो मातृप्रेम का गीत है, लेकिन विश्‍व के अनेक देशों के राष्‍ट्रगीत तो ऐसे हैं जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्‍वयं के देश की प्रजा के स्‍वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। लेकिन हमारी बात अलग है। भारत ने सदैव विश्‍वशांति को प्राथमिकता दी है। देश के पहले राष्‍ट्रपति डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

छोटे छोटे देशों के राष्‍ट्रगीत भी अनेक बार क्रूर और हिंसक होते हैं। इन्‍हें आततायियों और शत्रु को फटकार लगाने के लिए लिखा गया है। छोटे से देश डेनमार्क का उदाहरण लें। डेनमार्क के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है जो राजा क्रिश्‍टीएन के वीरत्‍व को उकसाती है। उनकी तलवार इतनी तेज चलती थी, शत्रु के कलेजे और सिर को एक साथ काट फेंकती थी। मध्‍य अमरीकी देश ग्‍वाटेमाला के राष्‍ट्रगीत में एक लाइन है-किसी आततायी को तेरे चेहरे पर नहीं थूकने दूंगा ! बल्‍गारिया के राष्‍ट्रगीत में भी आहूति की बात कही गई है। बेशुमार योद्धाओं को बहादुरी से मारा है-जनता के पवित्र उद्देश्‍य के लिए। चीन के राष्‍ट्रगीत में खून से सनी एक लाइन है -हमारे मांस और खून का ढ़ेर लगा देंगे-फिर से एक नई महान चीन की दीवार बनाने के लिए....।

अमरीका में मेरीलैंड नामक एक राज्‍य है। इस राज्‍य का भी राज्‍यगीत या राष्‍ट्रगीत है, जो वीरत्‍व से भरा पड़ा है, इसमें शब्‍द हैं कि- बाल्टिमोर की सड़कों पर फैला हुआ है देशभक्‍तों का नुचा हुआ मांस- इसका बदला लेना है साथियों...! इन सभी की तुलना में सुजलां, सुफलां मलयज शीतलाम् अथवा मीठे जल, मीठे फल और ठंडी हवा की धरती जैसे विचारों का विरोध हो रहा है। यह कितना साम्‍प्रदायिक लग रहा है?ब्रिटेन का राष्‍ट्रगीत ‘गॉड सेव द क्विन (या किंग)’ को 19वीं सदी की शुरूआत में स्‍वीकृति मिली। वर्ष 1745 में इसे पहली बार सार्वजनिक तौर पर गाया गया, लेकिन इसकी रचना किसने की, किसने संगीत दिया इस विषय में जरा अस्‍पष्‍टता है। लेकिन इससे पूर्व जिस गीत ने राष्‍ट्रगीत का दर्जा पाया, वह कैसे भाव व्‍यक्‍त करता है ? रुल ब्रिटानिया, रुल दि वेव्‍ज/ब्रिटंस नेवर शेल बी स्‍लेव्‍ज (देवी ब्रिटानिया राज करेगी, समुद्रों पर राज करेगी, ब्रिटिश कभी गुलाम नहीं बनेंगे) इस गीत में आगे है- तेरे नगर व्‍यापार से चमकेंगे/हरेक किनारे पर तेरी शोभा होगी....।

बेल्जियम का राष्‍ट्रगीत ‘ब्रेबेनकॉन’ था। जिसे एक फ्रेंच कामेडियन ने लिखा था। इस गीत में डच प्रजा के खिलाफ विष उगला गया था। इसके शब्‍दों में तीन बार संशोधन करना पड़ा। वर्ष 1984 में आस्‍ट्रेलिया ने ‘एडवांस आस्‍ट्रेलिया फॉर’ राष्‍ट्रगीत निश्चित किया। रुस का राष्‍ट्रगीत ‘जिन सोवियत स्‍कोगो सोयूजा’ (सोवियत संघ की प्रार्थना) 1944 में स्‍वीकार किया गया और 1814 में अमरीका ने फ्रांसीस स्‍कॉट नामक कवि के ‘स्‍टार स्‍पेंगल्‍ड बेनर’ राष्‍ट्रगीत के रुप में स्‍वीकार किया। इससे पूर्व रुस ने ‘इंटरनेशनल’ को राष्‍ट्रगीत माना था।

इजरायल का राष्‍ट्रगीत ‘हा-निकवा’ केवल इतना ही है। दिल के अंदर गहरे गहरे तक/ यहूदी की आत्‍मा को प्‍यास है/ पूर्व की दिशा/ एक आखं जायोन देख रही है/ अभी हमारी आशाएं बुझी नहीं हैं/ दो हजार वर्ष पुरानी हमारी आशा/ हमारी धरती पर आजाद प्रजा होने की आशा/ जायोन की धरती और येरुश्‍लम...। फ्रांस का राष्‍ट्रगीत ‘लॉ मार्सेस’ विश्‍व के सर्वाधिक प्रसद्धि राष्‍ट्रगीतों में एक है। वर्ष 1792 में फौज के इंजीनियर कैप्‍टन कलोड जोजफ रुज दि लिजले ने अप्रैल महीने की एक रात यह गीत लिखा और इसके बाद इतिहास में हजारों फ्रांसीसियों ने इस गीत के पीछे अपने को शहीद कर दिया। बहुचर्चित इस राष्‍ट्रगीत की दो लाइनें इस प्रकार है अपने ऊपर जुल्‍मगारों का रक्‍तरंजित खंजर लहरहा है। तुम्‍हें सुनाई देता है अपनी भूमि पर से कूच करके आते भयानक सैनिकों की गर्जनाएं..?...साथी नागरिकों ! उठाओं शस्‍त्र, बनाओं सेना/ मार्च ऑन, मार्च ऑन/ दुशमनों के कलुषित रक्‍त से अपनी धरती को गीली कर दो...। फ्रांस के इस राष्‍ट्रगीत की इन दो पक्तिंयों की चर्चा समय असयम फ्रांस और उसके पड़ौसी देशों में होती रहती है। अभी इन दो पक्तियों की बजाय जो नई दो पंक्तियां सुझाई गई है वे थीं स्‍वाधीनता, प्रियतम स्‍वाधीनता/ शत्रु के किले टूट गए हैं/फ्रेंच बना, अहा, क्‍या किस्‍मत है/ अपने ध्‍वज पर गर्व है.../ नागरिकों, साथियों/ हाथ मिलाकर हम मार्च करें/ गाओं, गाते रहो/ कि जिसने अपनी गीत/ सभी तोपों को शांत कर दें..लेकिन फ्रांस की जनता ने इस संशोधन को स्‍वीकार नहीं किया। मूल पंक्तियों मे जो खुन्‍नस थी, जो कुर्बानी भाव था वह इनमें नहीं था। आज भी पुरानी पंक्तियां ज्‍यों की त्‍यों हैं और फ्रांसीसी फौजी टुकडि़यां इन्‍हें गाते गाते कूच करती हैं।

शायद सर्वाधिक विवादास्‍पद राष्‍ट्रगीत जर्मनी का ‘डोईशलैंड युबर एलिस’ है। जर्मनी के कितने ही राज्‍य पूरे गीत को राष्‍ट्रगीत के रुप में मानते थे। हिटलर के जमाने में भी यही राष्‍ट्रगीत था। लेकिन 1952 से जर्मनी ने तय किया कि केवल तीसरा पैरा ही राष्‍ट्रगीत रहेगा। जर्मनी के राष्‍ट्रगीत का पहला पैरा इस प्रकार है जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर/ रक्षा और प्रतिरक्षा की बात आए तब/ कंधे मिलाकर खड़े रहना साथियों/मियुज से मेमेल तक/ एडीज से बेल्‍ट तक/जर्मनी, जर्मनी सभी से ऊपर/जगत में सबसे ऊपर... यह गीत जबरदस्‍त चर्चा का विषय बने यह स्‍वाभाविक है, आज मियुज नदी फ्रांस और बेल्जियम में बहती है। बेल्‍ट डेनमार्क में है और एडीज इटली में है। जर्मनी के इस राष्‍ट्रगीत में पूरे जर्मनी की सीमाओं के विषय में बताया गया है। कितने ही लोगों के अनुसार यह ग्रेटर जर्मनी है और इसमें से उपनिवेशवाद की बू आती है जबकि जर्मनी की ऐसी कोई दूषित भावना नहीं है। जहां फ्रांस में पंक्तियां बदलने की चर्चा होती है, वहां जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं है। केवल जर्मनी ने ही राष्‍ट्रगीत के रुप में अहिंसक तीसरे पैरे को राष्‍ट्रगीत राष्‍ट्रगीत में स्‍वीकार किया है। इटली में भी 1986 में एक आंदोलन हुआ था। वहां राष्‍ट्रगीत जरा कमजोर महसूस किया जा रहा था। जनमत का कहना था कि संगीतज्ञ बर्डी के बजाय तेजतर्रार देशभक्ति वाले का गीत राष्‍ट्रगीत होना चाहिए। राष्‍ट्रगीत चर्चा में आए इससे चिंता नहीं करनी चाहिए।

प्रत्‍येक देश के राष्‍ट्रगीत में स्‍वाभिमान, गर्व होता है, राष्‍ट्रध्‍वज और राष्‍ट्रगीत ही ऐसी प्रेरणा होती है जिसके लिए सारी की सारी पीढि़यां सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर देती हैं। भारत में फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों के अंतिम शब्‍द होते थे ‘वंदे मातरम्...!...’

December 8, 2008

एक वोट ने दिन में दिखा दिए तारे

यदि देश के किसी नेता को यह पूछा जाए कि उसे चुनाव में केवल एक वोट अधिक न मिले तो क्‍या होगा, शायद पहली नजर में वह इसे नजरअंदाज कर दें और कह भी दें कि एक वोट उसे न मिला तो भी चलेगा क्‍योंकि वह बड़े अंतर से जीत का माद्दा रखता है। लेकिन यही बात यदि राजस्‍थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सी पी जोशी से कोई पूछे कि एक वोट की कीमत क्‍या होती है। इस सवाल का जवाब जोशी से बेहतर शायद ही कोई नेता दे पाएगा जिसने उन्‍हें न केवल राज्य का मुख्‍यमंत्री बनने से अटका दिया बल्कि विधानसभा में बैठने से ही रोक दिया। राजसमंद जिले की नाथद्वारा सीट से जोशी चुनाव हार गए हैं। जोशी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में शुमार थे। वे काफी दुर्भाग्यशाली रहे। वे केवल एक वोट से चुनाव हारे हैं। जोशी को भाजपा के कल्याण सिंह ने हराया। कल्याण को 62 हजार 216 वोट मिले। जबकि सी पी जोशी को 62 हजार 215 वोट ही मिल पाए। देश के सारे नेता इससे सबक लेंगे कि एक वोट ही उनको दिन में तारे दिखाने के लिए खूब है।

April 15, 2008

तिब्‍बतियों इस कमजोर दलाई लामा को हटाओं, यह तो चीन के साथ है


तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा ने धमकी दी है कि अगर तिब्बत में हिंसा नहीं थमी, तो वह निर्वासित सरकार के प्रमुख के पद से इस्तीफा दे देंगे। दलाई लामा ने कहा है कि अगर तिब्बत में हिंसा बेकाबू हुई तो मेरे पास इस्तीफा देने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होगा। अगर तिब्बत के ज्यादातर लोग हिंसा चाहते हैं, तो वह अपना पद छोड़ देंगे।

दलाई लामा ने जिस निर्वासित सरकार के प्रमुख पद से इस्‍तीफा देने की बात कही है, वह कैसी सरकार है। यह सरकार चलती कहां हैं। यदि दलाई लामा में जरा भी स्‍वाभिमान और अपने देश के लिए मर मिटने का जज्‍बा होता तो वह आम तिब्‍बतियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे होते। वे इस समय आम तिब्‍बति के साथ नहीं है। उन्‍होंने खुद कह दिया है कि तिब्‍बतियों को चीन के साथ रहना चाहिए। अपने देश का जो गर्व होता है और जो स्‍वाभिमान होता है, वह दलाई लामा में नहीं है।

भारत में शरण लेकर उन्‍होंने दुनिया भर में अपने देश के लिए कोई ढंग से आंदोलन नहीं चलाया और हमेशा दो तरफा बातें करते रहें जिसमें बीच बीच में चीन का जबानी चेतावनी देना उनका खास हथियार रहा। जिस देश, राष्‍ट्र में जन्‍म लिया, बलिदान उसी पर हो जाए....ऐसी प्रेरणा उनके खून में नहीं रही। भाग आए भारत और टिक गए धर्मशाला में। अपने देश पर मर मिटना किसी के लिए भी सौभाग्‍य की बात हो सकती है। जो लोग आज तिब्‍बत को आजाद कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं उन्‍हें मैं सलाम करता हूं।

ओलम्पिक मशाल में हमारे फुटबाल खिलाड़ी बायचुंग भूटिया और पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने भाग न लेने का जो फैसला किया वह तारीफ के योग्‍य है। दलाई लामा को इन्‍हीं से कुछ सीख लेना चाहिए। दलाई लामा ने केवल दुनिया घूमने और जगह जगह अपना सम्‍मान कराने एवं पुरस्‍कार लेने के अलावा क्‍या किया। पुरस्‍कार पाने के पुतले बन गए हैं ये दलाई लामा। अपने देशवासियों को कह रहे हैं कि चीन के साथ चुपचाप रहो, अरे उससे आजाद कब कराओगे अपने देश को। यह कैसी वीरता कि चीन के आगे झुक गए दलाई लामा।

दलाई लामा जिसे लोग अपनी आंखों और सिर पर बैठा लेते हैं, साक्षात भगवान का रुप बताते हैं वह तो भगोड़े जैसा व्‍यवहार कर रहे हैं और चीन के साथ देश के विलय को मान चुके हैं। हे, तिब्‍बतवासियों खुद लड़ो अपनी लड़ाई और अपने देश को आजाद कराने की लड़ाई तब तक लड़ना जब तक एक भी तिब्‍बतवासी जिंदा है। छोड दो ऐसे दलाई लामा को। आज चीन ने तिब्‍बत को हड़प लिया और अब भारत के कुछ हिस्‍सों पर कब्‍जा करने की कोशिश करेगा। चीन को रोकना जरुरी है। जिस देश की नीयत में खोट हो वह हमारा भाई नहीं हो सकता। हिंदी चीनी भाई भाई नहीं।

October 11, 2007

फीस के लिए हमबिस्‍तर होती हैं कैंब्रिज स्टूडेंट्स

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की सैकड़ों स्टूडेंट्स बतौर कॉल गर्ल और स्ट्रीपर के रूप में काम कर रही हैं। जानते हैं इसकी वजह क्या है ? यूनिवर्सिटी की फीस और महंगी होती कॉलेज लाइफ। इंस्टीट्यूट के स्टूडेंट न्यूजपेपर ' वर्सिटी ' में इस बारे एक रिपोर्ट छपी है। 'वर्सिटी' के मुताबिक कैंब्रिज में आजकल अंडरग्रैजुएट लाइफ महंगी हो गई है और खासतौर से उनके लिए जो लग्जरी के साथ जीवन जीना चाहते हैं। न्यूजपेपर में यह भी छपा है कि स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटी की फीस देने के लिए देह बेचने को मजबूर हैं। गौरतलब है कि यूनिवर्सिटी की सालना फीस 3.070 पाउंड है।

'वर्सिटी' ने एक स्टूडेंट के हवाले से दावा किया है कि उन्होंने फर्स्ट ईयर वर्किंग का आधा समय कॉल गर्ल के रूप में बिताया। इसके लिए उन्हें हर घंटे 50 पाउंड मिले। वह कहती हैं, 'इस दौरान मैंने जॉब भी किया लेकिन इससे मुझे ज्यादा आमदनी नहीं हो पाई। मैं दूसरी कई स्टूडेंट्स भी मिल चुकी हूं, जो यह काम करती हैं। एक बार जब आप इसे करते हैं, यह लुभाने लगता है। अगर आप बहुत जल्दी और आसानी से पैसा कमाना चाहते हैं, तो आपको यहां से दोनों चीजें मिलेंगी।' वह आगे कहती हैं, मैं एक रात में 1-7 क्लाइंट्स के साथ सोती हूं।

एक दूसरी स्टूडेंट कहती हैं, 'जब मैं स्ट्रीपर के तौर पर काम करती हूं तो मुझे हर डांस के लिए 100 पाउंड तक की रकम मिलती है।' एक दूसरी अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट ने दावा किया कि उन्होंने फर्स्ट ईयर के दौरान 40-50 लोगों से सेक्स संबंध बनाए। उन्होंने कहा, 'इस दौरान मुझे हर हफ्ते 1 हजार पाउंड तक की रकम मिली। मैं 2 महीने के दौरान 40-50 मौकों पर क्लाइंट्स के साथ हमबिस्तर हुई।' कैंब्रिज में इस काम के लिए कई एजेंसियां है। एक घंटे के लिए क्लाइंट से 120 पाउंड चार्ज किया जाता था, जिसमें 50 पाउंड एजेंसी के खाते में चला जाता था और 50 पाउंड मुझे मिलते थे। 20 पाउंड ड्राइवर ले लेता था।

वह कहती हैं कि मैं एक रात में 1-7 क्लाइंट के साथ हमबिस्तर हुई। क्लाइंट का एज ग्रुप भी अलग-अलग था। सबसे कम उम्र का क्लाइंट 18 साल का था जबकि सबसे अधिक दिन का 80 साल का। वह आगे कहती हैं कि मुझे ट्रिनिटी से भी बुलावा आया था, लेकिन मैं वहां नहीं गई। लड़कियों का मानना है कि यह कॉलेज में भी मुमकिन है, लेकिन व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए।

एक और अंडरग्रैजुएट स्टूडेंट्स जो स्ट्रीप डांस करने के लिए दूसरे शहरों में जाती हैं, कहती हैं- यह ऐसा पल होता है, जिसे मैं करना नहीं चाहती, लेकिन इससे कैरेक्टर बिल्डप होता है। मुझे अपने किसी जान पहचान वाले के सामने डांस करने मे काफी झिझक होती है। लेकिन सब लोग ऐसा कर रहे हैं। जो भी हो टीचर्स के लिए यह चिंता का विषय है। वे स्टूडेंट्स की हर संभव सहायता की कोशिश कर रहे हैं ताकि स्टूडेंट्स को ऐसा न करना पड़े। नवभारत टाइम्‍स से साभार

September 24, 2007

क्‍या खूब लगती हो, ज्‍यादा सैलेरी पाती हो...

अच्छा दिखने के बड़े फायदे होते हैं , हम ऐसा सुनते आए हैं। लेकिन अब यह बात साबित भी हो गई है। एक नए सर्वे में यह बात सामने आई है कि अच्छे दिखने वाले लोग अपने सहयोगियों से ज्यादा कमाते हैं। तनख्वाह का यह फर्क मामूली नहीं है। सर्वे के मुताबिक आकर्षक पुरुष और खूबसूरत महिलाएं अपने दफ्तर में सबसे खराब (बदसूरत) दिखने वाले सहयोगी से करीब 15 फीसदी ज्यादा तनख्वाह पाते हैं। अर्थशास्त्री जेम्स ऐंड्रिओनी और रागन पेट्री, जिन्होंने यह सर्वेक्षण किया , कहते हैं , ' तनख्वाह मे यह फर्क तब है जबकि वास्तव में बेहतर दिखने वाले कर्मचारी उतना ही काम करते हैं जितना कि उनके दूसरे साथी। '

एक अखबार को दिए इंटरव्यू में इन अर्थशास्त्रियों ने कहा , ' हमने पाया कि बेहतर शक्ल-सूरत को प्रीमियम मिलता है भले ही ऐसे लोग दूसरों जितना या फिर उनसे कम ही काम करते हों। ' आकर्षक लोग अपने से कम आकर्षक लोगों से ज्यादा पैसा कमाते हैं। कम आकर्षक लोग भी बदसूरत लोगों से इस मामले में बेहतर ट्रीटमेंट पाते हैं। '

रिसर्चर्स के मुताबिक इसकी एक वजह यह है कि ऐम्प्लॉयर ' खूबसूरत ' दिखने वाले कर्मचारियों से एक खास तरीके का व्यवहार करने की उम्मीद रखते हैं। स्टडी के अनुसार , ' खूबसूरती का प्रीमियम ऐसे लोगों के असल तौर-तरीकों पर निर्भर नहीं करता है बल्कि इस अपेक्षा पर , कि अच्छे दिखने वाले लोग किस तरह का व्यवहार करेंगे। '

अपनी रिसर्च के दौरान इन अर्थशास्त्रियों ने शारीरिक आकर्षण के लिहाज से बांटे गए 3 समूहों का अध्ययन किया। स्टडी में यह बात सामने आई कि आकर्षक लोगों के समूह में से 38 फीसदी देखने में ज्यादा सहज और मददगार थे , कम आकर्षक लोगों में से 18 फीसदी और बदसूरत लोगों के समूह में सिर्फ 5 फीसदी ही ऐसे दिखाई देते थे। रिसर्चर्स का दावा है कि आकर्षक लोग ज्यादा लोकप्रिय और कामयाब भी होते हैं। नवभारत टाइम्‍स से साभार

September 22, 2007

रेडियो मेरी सांस में बसा है : पियूष मेहता

रेडियो के बेहद पुराने श्रोता पियूष मेहता से रेडियो को लेकर उनके अनुभवों पर चर्चा की कमल शर्मा ने। इस बातचीत को पूरी तरह परोसा पियूष जी ने अपने एक पुराने लेख रेडियो की दुनिया के माध्‍यम से। आप भी लीजिए आनंद कि क्‍या कहते हैं पियूष जी। जो इस समय गुजरात के खूबसूरत शहर सूरत में रहते हैं।


पंडित स्‍व. नरेंद्र शर्मा के निर्देशन में आकाशवाणी की विविध भारती सेवा शुरू हुई थी, जो आज के हिसाब से बहुत कम समयावधि के लिए ही प्रसारण कर रही थी। ज्‍यादा रेडियो मनोरंजन रेडियो सिलोन ही परोसता था। जहां से गोपाल शर्मा (जिनसे मैंने अब तक दो बार मुलाकात की), उन्‍हीं जैसी समान आवाज वाले कुमार कांत, चेतन खेरा कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते थे और रेडियो सिलोन के व्‍यापारी प्रतिनिधि के रूप में भारत के मुंबई और चेन्‍नई में रेडियो एडवरटाइजिंग सर्विसेस के बाल गोविंद श्रीवास्‍तव (जिनसे मैंने तीन साल पहले अमीन सायानी के सौजन्‍य से मुंबई में पहली और आखिरी मुलाकात की थी) आवाज की दुनिया के सरताज अमीन सायानी (जिनसे पांच बार मिला हूं), ब्रज भूषण (संगीतकार व गायक भी) जिन्‍हें अमीन सायानी ने इस क्षेत्र में प्रवेश करवाया, अमीन सायानी के बड़े भाई और गुरु स्‍व. हमीद सायानी (अंग्रेजी कार्यक्रमों और विज्ञापन के लिए), नक्‍वी रिजवी श्रीमती कमल बारोट (जो हिंदी व गुजराती फिल्‍मों की पार्श्‍व गायिका भी रही), शिव कुमार, मुरली मनोहर स्‍वरुप संगीतकार वगैरह कार्यरत थे।

रेडियो पाकिस्‍तान भी हर रोज आधे घंटे का हिंदी फिल्‍मों गीतों का कार्यक्रम पेश करता था, जो 1965 में बंद हो गया। साथ में आकाशवाणी अहमदाबाद के गुजराती भाषी प्रवक्‍ता लेम्‍यूल हैरी की आवाज का भी मैं दिवाना था, जो कुछ समय के लिए दिल्‍ली से अखिल भारतीय गुजराती समाचार भी पढ़ते थे। उसके अतिरिक्‍त रजनी शास्‍त्री की आवाज भी सुंदर थी, जो गीतों भरी कहानी गीत गाथा के नाम से पेश करते थे। साथ में आकाशवाणी राजकोट के उदघोषक भरत याज्ञिक भी रविवारीय जय भारती कार्यक्रम से लोगों के चहेते हुए।

रेडियो पर क्रिकेट कामैंट्री में सभी अंग्रेजी भाषा के कामेंट्रटरों में विजय मर्चेंट, डिकी रत्‍नाकार, देवराज पुरी डॉ. नरोत्‍तम पुरी के पिता, कोलकाता से सरदेंदू सन्‍याल, चेन्‍नई से पी. आनंद राव और वीएम चक्रपाणि जो आकाशवाणी के समाचार प्रभाग के अंग्रेजी भाषा के समाचार वाचक भी थे और बाद में रेडियो आस्‍ट्रेलिया मेल्‍बार्न चले गए थे और वहां से हिंदी गानों के 15 मिनट के साप्‍ताहिक कार्यक्रम अंग्रेजी उदघोषणा के साथ गाने पेश करते थे, जो मैंने सुने थे एवं बेरी सबसे अधिक उल्‍लेखनीय है। हिंदी कामेंट्री की शुरूआत काफी सालों के बाद जसदेव सिंह ने की। बाद में सुशील दोशी और रवि चतुर्वेदी भी मुख्‍य थे। आकाशवाणी इंदौर से नरेन्‍द्र पंडित की हर गुरुवार के दिन दोपहर साढ़े बारह बजे पर फिल्‍म संगीत के विशेष साप्‍ताहिक कार्यक्रम की प्रस्‍तुति आज तक मुझे याद है, जो भोपाल से शॉर्ट वेव 41 मीटर बैंड पर सूरत में सुनाई पड़ता था। आकाशवाणी दिल्‍ली-ए पर गुलशन मधुर की आवाज भी याद रही, जो सालों बाद वायस ऑफ अमरीका हिंदी सेवा से सुनने को मिली।

विविध भारती सेवा मुंबई से शॉर्ट वेव के अलावा मीडियम वेव पर भी प्रसारित होती थी, जिसमें 1965 से देश्‍ा के हर भाग में जो स्‍थानीय मीडियम वेव विविध भारती केंद्रों की जो शुरूआत हुई, इस नीति के अंतर्गत 1967 से मुंबई से प्रसारित विविध भारती सेवा के प्रसारण से अलग मीडियम वेव के प्रसारण को विज्ञापन प्रसारण सेवा के अंतर्गत अलग स्‍टूडियो से कार्यरत किया गया, जो पुणे और नागपुर से भी जारी हुआ। केंद्रीय विविध भारती सेवा हर राज्‍य के मुख्‍य विविध भारती केंद्र को करीब दो महीने पहले अपने सभी कार्यक्रमों को स्‍पूल टेप पर ध्‍वनि मु्द्रित करके भेज देता थी। विज्ञापन की बुकिंग हर राज्‍य के मुख्‍य विविध भारती केंद्र पर ही अपने लिए और उस राज्‍य के बाकी सभी विविध भारती केंद्रों के लिए करीब एक साथ प्रसारण सेवा के सभी राज्‍यों के मुख्‍य केंद्रों केंद्रीय विविध भारती सेवा द्धारा भेजे गए कार्यक्रमों को अपने विज्ञापन की बुकिंग के अनुसार संपादित करके हर कार्यक्रमों की सम्‍पादित करके हर कार्यक्रमों की सम्‍पादित टेप्‍स राज्‍य के बाकी विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केंद्रों को भेजती थी। यह व्‍यवस्‍था एक लंबे समय के बाद हर सीबीएस केंद्र की स्‍थानीय बुकिंग पर परिवर्तित हुई।

आकाशवाणी की एफएम सेवा भी करीब 26 साल के पहले आरंभ हुई और करीब 16 साल पहले बहुस्‍तरीय हुई, जिसका पहला स्‍तर मेट्रो एम एम स्‍टीरियो था, जिसमें निजी प्रसारकों को समय स्‍लोट बेचे गए। बाद में जिला स्‍तरीय शहरों में स्‍थानीय खडं समयावधि वाले एफ एम मोनो प्रसारण वाले केंद्रों की शुरूआत हुई। जिसके अंतर्गत सूरत में 30 मार्च 1993 के दिन तीन घंटे के स्‍थानीय प्रसारण वाला केंद्र शुरू हुआ, जो मेरी अपनी व्‍याख्‍या अनुसार पूर्व प्राथमिक केंद्र था। बाद में विविध भारती के स्‍थानीय मध्‍यम तरंग केंद्रों को एफएम स्‍टीरियो में परिवर्तित करने की शुरूआत हुई। कुछ बड़े शहरों के स्‍थानीय खंड समय वाले एफएम केंद्रों को विविध भारती के विज्ञापन सेवा केंद्र के रुप में तबदील किया गया, जिसमें सूरत भी अगस्‍त 2002 से पूरे समय वाले विविध भारती के विज्ञापन प्रसारण सेवा के केंद्र में परिवर्तित हुआ, जो बाद में स्‍टीरियो भी हुआ।

इस तरह आज आकाशवाणी के सूरत, कानपुर और चंडीगढ़ तीन केंद्र शायद ऐसे हैं, जहां प्राथमिक चैनल न होते हुए, सिर्फ विविध भारती सेवा ही है। बड़ौदा में विज्ञापन प्रसारण सेवा के अलावा प्राइमरी चैनल के कार्यक्रमों का कुछ निर्माण तो होता है और कुछ कुछ प्रसारण भी होता है। लेकिन अहमदाबाद के जोडि़या केंद्र के रुप में अहमदाबाद के ट्रांसमीटर से ही हे। आज सभी श्रोताओं को जानकारी है कि कुछ सालों से विविध भारती सेवा के कार्यक्रम उपग्रह के द्धारा स्‍थानीय विज्ञापन प्रसारण केंद्रों से एफएम बैंड पर और मुंबई, दिल्‍ली, कोलकाता और चेन्‍नई में मध्‍यम तरंग पर एवं रात्रि 11.10 से सुबह 5.55 तक राष्‍ट्रीय प्रसारण सेवा से मध्‍यम तरंग और डीटीएच पर 24 घंटे सुने जा सकते हैं।

कुछ साल से कुछ विशेष कार्यक्रमों एवं फोन-इन कार्यक्रमों को छोड़कर ज्‍यादातर कार्यक्रमों का जीवंत प्रसारण होता है और किसी व्‍यक्ति विशेष की आकस्मिक मृत्‍यु होने पर जीवंत फोन-इन श्रद्धांजलि कार्यक्रम भी होते हैं। जबकि सम्‍पूर्ण प्री रेकोडेड कार्यक्रमों की व्‍यवस्‍था अंतर्गत ऐसे जीवंत फोन इन श्रद्धांजलि कार्यक्रमों की गुंजाइश ही नहीं थे और सिर्फ पहेली पुण्‍य तिथि पर ही कोई पूर्व प्रसारित जयमाला या एक फनकार कार्यक्रम हो सकते थे। मैं विविध भारती के फोन इन कार्यक्रमों में शामिल होने का करीब शुरु से ही भाग्‍यशाली रहा हूं और साल दो साल के अंतराल बाद जब भी मुंबई आना होता रहा तो विविध भारती सेवा के उदघोषकों और अन्‍य साथियों जैसे पूर्व निदेशक जयंत एरंडिकर, सहायक केंद्र निदेशक महेंद्र मोदी, कमल शर्मा, यूनुस जी, श्रीमती ममता, श्रीमती रेणु बंसल, श्रीमती मोना ठाकुर, अहमदवसी साहब, लोकेन्‍द्र शर्मा, राजेन्‍द्र त्रिपाठी, अशोक सोनावणे, राष्‍ट्रीय प्रसारण सेवा में सक्रिय कमल किशोर, अमरकांत दुबे, नागपुर में कार्यरत अशोक जाम्‍बूलकर सहित अनेक साथियों से मिलना होता है। 1962 से फिल्‍मी धुनों को सुनने का और उनके वादक कलाकार एवं साज को पहचानने का शौक लगा, जिसमें सबसे पहला आकर्षण प्रसिद्ध पियानो एकोर्डियन वादक एनोक डेनियल्‍स के प्रति हुआ, जिनकी धुनों को मैंने हैलो आपके अनुरोध पर कार्यक्रम में किस्‍तों में फरमाइश की थी।

वायस ऑफ अमरीका के दो सजीव कॊल-इन कार्यक्रम हैलो अमरीका और हैला इंडिया में तीन बार मुझे लाइव परिचर्चाओं में श्रोता के तौर पर इन विशेषज्ञों के पैनल से सवाल पूछने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था। २८ अप्रैल 2007 को विविध भारती के स्वर्ण स्मृति कार्यक्रम में कार्यक्रम की निर्मात्री और प्रस्‍तुतकर्ता श्रीमती कांचन प्रकाश संगीत ने मेरा टेलिफो़निक इंटरव्‍यू प्रस्‍तुत किया था और उसमें मेरे संस्मरणों के साथ मेरी उसी बातचीत के दौरान बजाई माऊथ ओर्गन पर फ़िल्मी धुन का हिस्सा भी प्रस्‍तुत किया था।

पियूष मेहता रेडियो जगत की जानी मानी हस्तियों के साथ-- फोटो के लिए यहां देखें

September 18, 2007

सरकारी गुंडों ने रोका जगदीप दांगी को हिंदी सम्‍मेलन में जाने से

जगदीप दांगी 8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क अमरीका में 13-15 जुलाई को क्‍यों नहीं भाग ले पाए। पढि़ए यह व्‍यथा जो उन्‍होंने कई लोगों को बताई। इससे साफ पता चलता है कि सरकारी सत्‍ता में बैठे गुंडे कैसे रोकते हैं एक प्रतिभा को। प्रतिभा पलायन के लिए इसी तरह के गुंडे जिम्‍मेदार हैं। है कोई बहरों के देश में सुनने वाला।
दांगी जी के अनुसार : 8वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन न्यूयार्क अमरीका में 13-15 जुलाई को था. इस सम्मेलन में मुझे अमरीका से आमंत्रण पत्र आया था। भारतीय विद्या भवन न्यूयार्क के कार्यकारी निदेशक डाँ. पी जयरामन की तरफ़ से मुझे 15 जून को आमंत्रण पत्र आया था। इस सम्मेलन के लिए मेरा रजिस्ट्रेशन न्यूयार्क में ही हुआ था। मेरा रजिस्ट्रेशन अनूप भार्गव [(Anoop Bhargava) Member - Organizing Committee Vishwa Hindi Sammelan] ने 26 जून को कराया था और रजिस्ट्रेशन के लगभग पांच हजार रुपए शुल्क भी उन्होंने ही जमा किए। मेरा रजिस्ट्रेशन न. 2105 था। न्यूयार्क लाने ले जाने और वहां ठहरने का पूरा खर्च आर.एन. मेहरोत्रा जी कर रहे थे वह मेरे स्पोनसर थे। मेरे पास सम्मेलन में जाने के लिये आमंत्रण पत्र था, और आर.एन. मेहरोत्रा का कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास ग्वालियर की तरफ़ से स्पोनसर लेटर भी था। मेहरोत्रा कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास ग्वालियर के अधयक्ष हैं।

इन पत्रों के आधार पर मेरा तत्काल पासपोर्ट बन गया था। लेकिन मैं उस सम्मेलन में जा नहीं सका क्योंकि अमरीकी दूतावास ने मेरा वीजा खारिज कर दिया और उसके खारिज होने का मुझे कोई उपयुक्त कारण भी नहीं बताया। मैंने पूछा तो कहा की आफ़िसर आपसे संतुष्‍ट नहीं है सॉरी..सॉरी... मैं समझ गया की यह सब इसलिए हुआ की मेरे पास आईआईआईटीएम का एनओसी लैटर नहीं था।

आईआईआईटीएम ग्वालियर से मैंने एनओसी पत्र भी मांगा था पर मुझे वह पत्र न तो निदेशक डॉ. ओम विकास ने दिया और न ही रजिस्‍ट्रार डी. कुमार ने दिया और मेरा वीजा आखिर खारिज हो गया। Mrs. Madhu Goswami , Deputy Secretary , Hindi at the Ministry of External Affairs को भी न्यूयार्क से अनूप भार्गव, पी. जयरामन,Reenat Sandhu Consul [Education] CGI, New YorkTel: (212) 774 0627Fax: (212) 879 7914E-mail: edu@indiacgny.org, "Ashok" < ashok@indiacgny.org>, आदि कई लोगों ने श्रीमति Madhu Goswami , Deputy Secretary से मुझे वीजा दिलाने को बार बार कहा। मैं भी उनके आफिस में दो दिन चक्कर लगाता रहा पर उनकी निजी सचिव ने मुझे उनसे मिलने तक नहीं दिया।

मुझे ऐसा आभास हो रहा था की यह लोग जानबूझ कर मुझे अमरीका जाने से रोक रहे थे कोई न कोई तो इसके पीछे था। क्‍योंकि अगर मैं वहां जाता तो यह बात जरूर सामने आती की एक लड़के ने हिंदी के लिए जो काम किया है उसी तरह के काम के लिए भारत सरकार ने लगभग 600 करोड़ रुपए खर्च किए और पब्लिक को हिंदी सॉफ्टवेयर के नाम पर कचरा बांट दिया और जगदीप का काम सरकारी काम से हजार गुना अच्छा था उसे दबा दिया गया। इसे भी देखें अंग्रेजी की मुश्किल से मिली हिंदी को मंजिल...

September 14, 2007

खो गया झुमरी तिलैया का सरगम

अगर आप रेडियो के श्रोता रहे हैं तो फरमाइशी गीतों के कार्यक्रमों में ‘झुमरी तिलैया’ का नाम अवश्‍य सुना होगा। 1950 से 1980 तक रेडियो से प्रसारित होने वाले फिल्‍मी गीतों के फरमाइशी कार्यक्रमों में शायद ही किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोताओं ने फरमाइश न भेजी हो। हाल यह था कि हर किसी गीत के सुनने वाले श्रोताओं में झुमरी तिलैया का नाम कम से कम एक बार तो जरुर प्रसारित किया जाता था। इस तरह झुमरी तिलैया का नाम दिन में बार बार सुनने में आता था जिसके कारण रेडियो श्रोताओं में झुमरी तिलैया का नाम प्रसिद्ध हो गया था।

सही अर्थों में कहा जाए तो झुमरी तिलैया को विश्‍वविख्‍यात बनाने का श्रेय वहां के स्‍थानीय रेडियो श्रोताओं को जाता है जिनमें रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल, गंगालाल मगधिया, कुलदीप सिंह आकाश, राजेंद्र प्रसाद, जगन्‍नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, पवन कुमार अग्रवाल, लखन साहू और हरेकृष्‍ण सिंह प्रेमी के नाम मुख्‍य हैं। मुंबई से प्रकाशित धर्मयुग में वर्षों पहले छपे एक लेख में विष्‍णु खरे ने लिखा था कि उदघोषक अमीन सयानी को प्रसिद्ध बनाने में झुमरी तिलैया के रेडियो श्रोताओं में खासतौर पर रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल का हाथ है।

बिहार में गया रेलवे स्‍टेशन के अगले स्‍टेशन कोडरमा के बाहरी क्षेत्र को झुमरी तिलैया के नाम से जाना जाता है। यह बिहार की राजधानी पटना से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसकी आबादी एक लाख के करीब होगी। यहां विश्‍वविख्‍यात अभ्रक की खानें हैं और यहां का कलाकंद भी प्रसिद्ध है। वर्णवाल के बारे में लोगों का कहना है कि उनकी पहली फरमाइश रेडियो सिलोन से पढ़ी गई थी। फिल्‍म ‘मुगले आजम’ का गीत ‘जब प्‍यार किया तो डरना क्‍या’ के लिए उन्‍होंने टेलीग्राम से फरमाइश भेजी थी। रेडियो सिलोन से अक्‍सर यह प्रसारण होता था कि आप ही के गीत कार्यक्रम में झुमरी तिलैया से रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल ने ‘दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो रे, गजब भयो रामा जुलुम भयो रे’ फरमाइश की है। झुमरी तिलैया से गंगालाल मगधिया, कुलदीप सिंह ‘आकाश’, राजेंद्र प्रसाद, जगन्‍नाथ साहू, धर्मेंद्र कुमार जैन, पवन कुमार अग्रवाल, लखन साहू ने भी इसी गीत की फरमाइश की है।

रेडियो पर फरमाइश को लेकर कई अजूबे जुड़े हुए हैं। एक बार ऐसा हुआ कि आल इंडिया रेडियो पर गंगा जमुना फिल्‍म का गीत दो हंसो का जोड़ा बिछुड़ गयो रे बज रहा था। गीत समाप्‍त होने पर उदघोषक ने घोषणा की कि अभी अभी झुमरी तिलैया से रामेश्‍वर प्रसाद वर्णवाल का भेजा हुआ टेलीग्राम हमें प्राप्‍त हुआ है, जिसमें उन्‍होंने दो हंसों का जोड़ा सुनाने का अनुरोध किया है। अत: यह गीत हम आपको पुन: सुना रहे हैं। टीवी के व्‍यापक आगमन से पहले रेडियो के अलावा मनोरंजन का दूसरा साधन नहीं था। ग्रामोफोन प्‍लेयर बहुत कम लोगों के पास था।

फरमाइश भेजने वालों में हरेकृष्‍ण सिंह ‘प्रेमी’ कभी पीछे नहीं रहे। यह अलग बात है कि वे अपनी हरकतों व कथित प्रेमी होने के कारण हमेशा चर्चा में रहे। फरमाइशों में अपने नाम के बाद अपनी कथित प्रेमिका प्रिया जैन का नाम भी जोड़ा करते थे जिसके कारण वे प्रसिद्ध हुए। यह बात अलग है कि उनकी प्रिया जैन से शादी नहीं हुई।

एक और दिलचस्‍प बात यह है कि रेडियो पर फरमाइश भेजने वालों में आपसी होड़ इस हद तक बढ़ गई थी कि लोग एक दूसरे की डाक को गायब करवाने और रुकवाने के लिए डाक छांटने वाले कर्मचारियों को रुपए देते थे। तब कई गंभीर श्रोता फरमाइशी पत्रों को भेजने के लिए गया और पटना तक जाने लगे जिससे डाक खर्च भी बढ़ गया। उन दिनों इस तरह के पत्र पर कम से कम 25 से 35 रुपए खर्च होने लगे।

एक और दिलचस्‍प प्रकरण के तहत एक सज्‍जन फरमाइश भेजने वाली लड़की से उसका मनपसंद गीत सुनने के बाद उससे प्रेम करने लगे। वे उसके प्रेम में इस हद तक पागल हो गए कि जिस दिन उस लड़की की शादी हो रही थी वहां जा पहुंचे और हंगामा खड़ा कर दिया कि मैं इस लड़की से शादी करूंगा। खैर लोगों के बहुत समझाने बुझाने और माथापच्‍ची करने के बाद मामला शांत हुआ।
झुमरी तिलैया के संबंध में सबसे ज्‍यादा रोचक बात यह थी कि जिस किसी फिल्‍म के किसी गीत को सुनने के लिए झुमरी तिलैया के श्रोता अपनी फरमाइश भेजते थे उस फिल्‍म को और उस गीत को मुंबई फिल्‍म उद्योग के बॉक्‍स ऑफिस पर हिट माना जाता था। यह सिलसिला कई साल से खत्‍म हो गया है। निजी टीवी चैनलों और दूरदर्शन की मार से रेडियो श्रोता बहुत कम रह गए हैं, साथ ही झुमरी तिलैया का सरगम भी खो गया है। इस सरगम को पढ़ने के बाद विंडो बंद मत किजिए बल्कि दिल से अपनी टिप्‍पणी ब्‍लॉग को भेजिए।

September 7, 2007

कठमुल्‍लाओं का एक और बेवकूफी भरा फतवा

प्रमुख इस्लामिक संस्था दारुल-उलूम देवबंद ने फोटोग्राफी को शरीयत कानूनों के खिलाफ करार देते हुए इस पर पाबंदी लगाने वाला एक फतवा जारी किया है। हालांकि, समझा जाता है कि संस्था ने खुद अपने छात्रों और कर्मचारियों को फोटो पहचान पत्र जारी कर रखे हैं।

दारुल-उलूम के सूत्रों के मुताबिक 4 मौलवियों ने व्यवस्था दी कि फोटो खींचना या खिंचवाना शरीयत के तहत गैरकानूनी है। पाबंदी को कानूनी रूप नहीं दिया जा रहा है तो सिर्फ इसलिए कि आमतौर पर फोटोग्राफी काफी चलन में है। इन मौलवियों में फतवा विभाग के प्रमुख मुफ्ती हबीबुर्रहमान के अलावा मुफ्ती महमूद, मुफ्ती जैनूलइस्लाम, मुफ्ती जैफुरुद्दीन शामिल है। यह फतवा असम के एक सामाजिक संगठन द्वारा फोटोग्राफी को लेकर उठाए गए सवाल के जवाब में आया है।

गौरतलब है कि यह विवादास्पद फतवा ऐसे समय में आया है, जब देश के करीब एक लाख मुसलमान हज यात्रा की तैयारी कर रहे हैं और उनके पास फोटो वाले पासपोर्ट हैं। उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब जैसे मुस्लिम देशों ने फोटोग्राफी को इजाजत दे रखी है और उनकी सरकारों ने अपने नागरिकों को फोटो वाले पासपोर्ट और पहचान पत्र जारी कर रखे हैं।

इस बीच, शरीयत अदालत के एक सदस्य और उत्तर प्रदेश इमाम संगठन के अध्यक्ष मुफ्ती जुल्फिकार ने कहा कि फोटोग्राफी के शरीयत कानून के खिलाफ होने के बावजूद इससे बचा नहीं जा सकता, क्योंकि आमतौर पर यह काफी इस्तेमाल किया जाता है। फिर भी, लोगों को आपत्तिजनक तस्वीरों और गैर-जरूरी फोटोग्राफी से खुद को दूर रखना चाहिए। नवभारत टाइम्‍स से साभार

September 6, 2007

कंप्‍यूटर की बोर्ड के सौ शार्ट कट

CTRL+C (Copy)
CTRL+X (Cut)
CTRL+V (Paste)
CTRL+Z (Undo)
DELETE (Delete)
SHIFT+DELETE (Delete the selected item permanently without placing the item in the Recycle Bin)
CTRL while dragging an item (Copy the selected item)
CTRL+SHIFT while dragging an item (Create a shortcut to the selected item)
F2 key (Rename the selected item)
CTRL+RIGHT ARROW (Move the insertion point to the beginning of the next word)
CTRL+LEFT ARROW (Move the insertion point to the beginning of the previous word)
CTRL+DOWN ARROW (Move the insertion point to the beginning of the next paragraph)
CTRL+UP ARROW (Move the insertion point to the beginning of the previous paragraph)
CTRL+SHIFT with any of the arrow keys (Highlight a block of text)
SHIFT with any of the arrow keys (Select more than one item in a window or on the desktop, or select text in a document)
CTRL+A (Select all)
F3 key (Search for a file or a folder)
ALT+ENTER (View the properties for the selected item)
ALT+F4 (Close the active item, or quit the active program)
ALT+ENTER (Display the properties of the selected object)
ALT+SPACEBAR (Open the shortcut menu for the active window)
CTRL+F4 (Close the active document in programs that enable you to have multiple documents open simultaneously)
ALT+TAB (Switch between the open items)
ALT+ESC (Cycle through items in the order that they had been opened)
F6 key (Cycle through the screen elements in a window or on the desktop)
F4 key (Display the Address bar list in My Computer or Windows Explorer)
SHIFT+F10 (Display the shortcut menu for the selected item)
ALT+SPACEBAR (Display the System menu for the active window)
CTRL+ESC (Display the Start menu)
ALT+Underlined letter in a menu name (Display the corresponding menu)
Underlined letter in a command name on an open menu (Perform the corresponding command)
F10 key (Activate the menu bar in the active program)
RIGHT ARROW (Open the next menu to the right, or open a submenu)
LEFT ARROW (Open the next menu to the left, or close a submenu)
F5 key (Update the active window)
BACKSPACE (View the folder one level up in My Computer or Windows Explorer)
ESC (Cancel the current task)
SHIFT when you insert a CD-ROM into the CD-ROM drive (Prevent the CD-ROM from automatically playing)
Dialog Box Keyboard Shortcuts
CTRL+TAB (Move forward through the tabs)
CTRL+SHIFT+TAB (Move backward through the tabs)
TAB (Move forward through the options)
SHIFT+TAB (Move backward through the options)
ALT+Underlined letter (Perform the corresponding command or select the corresponding option)
ENTER (Perform the command for the active option or button)
SPACEBAR (Select or clear the check box if the active option is a check box)
Arrow keys (Select a button if the active option is a group of option buttons)
F1 key (Display Help)
F4 key (Display the items in the active list)
BACKSPACE (Open a folder one level up if a folder is selected in the Save As or Open dialog box)
m*cro$oft Natural Keyboard Shortcuts
Windows Logo (Display or hide the Start menu)
Windows Logo+BREAK (Display the System Properties dialog box)
Windows Logo+D (Display the desktop)
Windows Logo+M (Minimize all of the windows)
Windows Logo+SHIFT+M (Restore the minimized windows)
Windows Logo+E (Open My Computer)
Windows Logo+F (Search for a file or a folder)
CTRL+Windows Logo+F (Search for computers)
Windows Logo+F1 (Display Windows Help)
Windows Logo+ L (Lock the keyboard)
Windows Logo+R (Open the Run dialog box)
Windows Logo+U (Open Utility Manager)
Accessibility Keyboard Shortcuts
Right SHIFT for eight seconds (Switch FilterKeys either on or off)
Left ALT+left SHIFT+PRINT SCREEN (Switch High Contrast either on or off)
Left ALT+left SHIFT+NUM LOCK (Switch the MouseKeys either on or off)
SHIFT five times (Switch the StickyKeys either on or off)
NUM LOCK for five seconds (Switch the ToggleKeys either on or off)
Windows Logo +U (Open Utility Manager)
Windows Explorer Keyboard Shortcuts
END (Display the bottom of the active window)
HOME (Display the top of the active window)
NUM LOCK+Asterisk sign (*) (Display all of the subfolders that are under the selected folder)
NUM LOCK+Plus sign (+) (Display the contents of the selected folder)
NUM LOCK+Minus sign (-) (Collapse the selected folder)
LEFT ARROW (Collapse the current selection if it is expanded, or select the parent folder)
RIGHT ARROW (Display the current selection if it is collapsed, or select the first subfolder)
Shortcut Keys for Character Map
After you double-click a character on the grid of characters, you can move through the grid by using the keyboard shortcuts:
RIGHT ARROW (Move to the right or to the beginning of the next line)
LEFT ARROW (Move to the left or to the end of the previous line)
UP ARROW (Move up one row)
DOWN ARROW (Move down one row)
PAGE UP (Move up one screen at a time)
PAGE DOWN (Move down one screen at a time)
HOME (Move to the beginning of the line)
END (Move to the end of the line)
CTRL+HOME (Move to the first character)
CTRL+END (Move to the last character)
SPACEBAR (Switch between Enlarged and Normal mode when a character is selected)
m*cro$oft Management Console (MMC) Main Window Keyboard Shortcuts
CTRL+O (Open a saved console)
CTRL+N (Open a new console)
CTRL+S (Save the open console)
CTRL+M (Add or remove a console item)
CTRL+W (Open a new window)
F5 key (Update the content of all console windows)
ALT+SPACEBAR (Display the MMC window menu)
ALT+F4 (Close the console)
ALT+A (Display the Action menu)
ALT+V (Display the View menu)
ALT+F (Display the File menu)
ALT+O (Display the Favorites menu)
MMC Console Window Keyboard Shortcuts
CTRL+P (Print the current page or active pane)
ALT+Minus sign (-) (Display the window menu for the active console window)
SHIFT+F10 (Display the Action shortcut menu for the selected item)
F1 key (Open the Help topic, if any, for the selected item)
F5 key (Update the content of all console windows)
CTRL+F10 (Maximize the active console window)
CTRL+F5 (Restore the active console window)
ALT+ENTER (Display the Properties dialog box, if any, for the selected item)
F2 key (Rename the selected item)
CTRL+F4 (Close the active console window. When a console has only one console window, this shortcut closes the console)
Remote Desktop Connection Navigation
CTRL+ALT+END (Open the m*cro$oft Windows NT Security dialog box)
ALT+PAGE UP (Switch between programs from left to right)
ALT+PAGE DOWN (Switch between programs from right to left)
ALT+INSERT (Cycle through the programs in most recently used order)
ALT+HOME (Display the Start menu)
CTRL+ALT+BREAK (Switch the client computer between a window and a full screen)
ALT+DELETE (Display the Windows menu)
CTRL+ALT+Minus sign (-) (Place a snapshot of the active window in the client on the Terminal server clipboard and provide the same functionality as pressing PRINT SCREEN on a local computer.)
CTRL+ALT+Plus sign (+) (Place a snapshot of the entire client window area on the Terminal server clipboard and provide the same functionality as pressing ALT+PRINT SCREEN on a local computer.)
m*cro$oft Internet Explorer Navigation CTRL+B (Open the Organize Favorites dialog box)
CTRL+E (Open the Search bar)
CTRL+F (Start the Find utility)
CTRL+H (Open the History bar)
CTRL+I (Open the Favorites bar)
CTRL+L (Open the Open dialog box)
CTRL+N (Start another instance of the browser with the same Web address)
CTRL+O (Open the Open dialog box, the same as CTRL+L)
CTRL+P (Open the Print dialog box)
CTRL+R (Update the current Web page)
CTRL+W (Close the current window)

ब्‍लॉग मचा रहे हैं धूम


जैसे-जैसे इंटरनेट तक ज्यादा से ज्यादा लोगों की पहुंच हो रही है, ब्लॉगिंग की पॉप्युलैरिटी भी बढ़ रही है। ऐसे में ब्लॉग तेजी से एक ऑप्शनल मीडिया का रूप ले रहा है।

इंटरनेट पर लगातार बढ़ रही ब्लॉग्स की तादाद के बारे में आपने सोचा है? ये ब्लॉग तेजी से ट्रडिशनल मीडिया के ऑप्शन के रूप में उभर रहे हैं। ब्लॉग्स की पॉप्युलैरिटी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि भविष्य में ऐसा भी वक्त आएगा, जब लोग देश-दुनिया की खबरें जानने के लिए न तो टीवी से चिपके रहेंगे और न ही सुबह होते ही अखबार का इंतजार करते मिलेंगे। ब्लॉग्स न केवल तेजी से सूचनाएं मुहैया कराने का जरिया बन रहे हैं, बल्कि पल भर में लोगों को किसी मुद्दे पर अपनी राय दुनिया तक पहुंचाने का मंच भी मुहैया करा रहे हैं।

ब्लॉगिंग के मौजूदा ट्रेंड पर नजर डालें, तो पता चलता है कि अभी इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से जेन-एक्स ही इन्वॉल्व है। भले ही ब्लॉगर्स में ज्यादा तादाद युवाओं की हो, लेकिन इसमें विषयों की पूरी वैरायटी मिलती है। यानी आपको किसी भी विषय पर ब्लॉग मिल जाएंगे। आप टीनएजर्स के ऐसे कई ब्लॉग्स देख सकते हैं, जहां वे अपनी जिंदगी, नाकामयाब रिश्तों आदि के बारे में बात करते हैं। कई प्रफेसर्स अपने स्टूडेंट्स को पढ़ाई के टिप्स देने के लिए भी ब्लॉग का इस्तेमाल करते हैं। यही नहीं, तमाम सुनी-अनसुनी, कही-अनकही और विश्वसनीय या अविश्वसनीय बातों या मुद्दों से संबंधित ब्लॉग आपको मिल जाएंगे। कुल मिलाकर कहें, तो ब्लॉग्स के दायरे से कोई भी टॉपिक, सब्जेक्ट या इशू अछूता नहीं रह गया है।

इंटरनेट ऐंड मोबाइल असोसिएशन ऑफ इंडिया के असोसिएट वाइस प्रेजिडेंट मेहुल गुप्ता कहते हैं, 'ब्लॉग अल्टरनेटिव मीडिया के रूप में उभर जरूर रहा है, लेकिन अभी यह शुरुआती अवस्था में ही है। हां, यह लोगों की दमदार आवाज के रूप में जरूर सामने आ रहा है।' ब्लॉग अभी भले ही शुरुआती दौर में हो, लेकिन भारत में जिस रफ्तार से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उसे देखते हुए स्थिति तेजी से बदलने की उम्मीद बंधती है। एक आंकड़े के मुताबिक, दुनिया में कुल इंटरनेट इस्तेमाल का 36 फीसदी एशिया के खाते में है।

एशिया में पिछले कुछ वर्षों के दौरान इंटरनेट के इस्तेमाल में जहां 258 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, वहीं भारत के मामले में यह आंकड़ा 700 फीसदी रहा। ऐसे में फुल-टाइम ब्लॉगर धीरज सिंह की इस बात में दम लगता है, 'मौजूदा प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद तीसरे विकल्प के रूप में ब्लॉग्स तेजी से उभर रहे हैं।' किसी भी तरह की जानकारी के लिए ब्लॉग पर निर्भर रहने वाले, इंजीनियर मुनीर हैदर कहते हैं, 'ब्लॉग्स में ऑप्शनल मीडिया की जगह लेने की ताकत है। जब देश में ज्यादा से ज्यादा लोग इंटरनेट यूज़ करने लगेंगे, तब तो ब्लॉगिंग के विकास की कोई सीमा ही नहीं रह जाएगी। जब तक ऐसा नहीं हो रहा है, तब तक ब्लॉग्स लोगों के लिए अपनी आवाज़ रखने के नए विकल्प के रूप में जगह बना रहे हैं।' नवभारत टाइम्‍स से साभार

August 31, 2007

मुंबई पुलिस सीखाती है कार चोरी करना

मुंबई पुलिस सीखाती है कार चोरी करना.....इस शीर्षक का देखकर चौंके नहीं बल्कि यह सच है। मुंबई पुलिस ने जहां पिछले दिनों कहा था कि वह महानगर में बढ़ती कार चोरी को रोकने के लिए कारगर कदम उठाएगी और जल्‍दी ही कार चोरों के साथ यह जानने का प्रयास करेगी कि वे कार चोरी के लिए कैसे कैसे तरीके अपनाती है ताकि लोगों को बताकर कार चोरी को थामा जा सके। लेकिन मैंने खुद एक नजारा ऐसा देखा कि जहां पुलिस ही कार चोरी का तरीका आम पब्लिक को बता रही थी। बात मेरे कार्यालय के बाहर की है, मेरा कार्यालय मुंबई के उपनगर माटुंगा रोड में न्‍यू एरा हाउस में है। कार्यालय के बाहर मैं लंच के बाद तरोताजा होने के लिए कुछ देर के लिए खड़ा था। तभी वहां मुंबई ट्राफिक पुलिस की टोइंग गाड़ी जिसके सहारे नो पार्किंग जोन में खड़ी गाडि़यों को पुलिस चौकी ले जाया जाता है, आई और एक मारुति वैन को उठाने का प्रयास किया।

मुंबई ट्राफिक पुलिस के कांसटेबल के साथ चार पांच लड़के भी थे, जो इस टोइंग गाड़ी के साथ दुपहिया, चौपहिया उठाने के लिए हमेशा रहते हैं। इस मारुति वैन को वे चाहते थे वैसे ही उठाकर ले जा सकते थे। लेकिन मेरे सहित वहां खड़े तकरीबन 20 व्‍यक्तियों ने देखा कि ट्राफिक कांसटेबल के कहने पर तीन लड़कों ने प्‍लास्टिक की सी पतली पत्‍ती निकाली और ड्राइवर साइड के दोनों विंडों की ओर उन्‍हें घुसेड़कर गाड़ी का लॉक दस सेकंड में खोल दिया। इस लॉक के खुलते ही मारुति वैन के दरवाजे भी खुल गए।

मारुति वैन में एक बैग भी रखा था जिसकी तलाशी उस कांसटेबल ने आगे जाकर ली होगी क्‍योंकि तभी लोग उस कांसटेबल से कहने लगे कि इसमें तो बैग रखा है। सभी यह कह रहे थे कि मारुति वैन को वैसे भी ले जाया जा सकता था तो पत्‍ती के माध्‍यम से लॉक क्‍यों खोला गया। पुलिस वाले के कहने पर जब सब के सामने लॉक खोला गया तो क्‍या इस तकनीक को दूसरों ने नहीं सीख लिया। क्‍या ये लड़के जो इतना कुछ जानते हैं दूसरों को यह तकनीक नहीं सिखाते होंगे। क्‍या ये लड़के राजा हरिशचंद्र के वंशज है जो खुद कभी कार चोरी में शामिल नहीं होंगे पैसे के लालच या किसी मजबूरीवश। इन सभी सवालों सहित अनेक सवालों के जवाब नहीं है हमारे सामने।

August 11, 2007

महिलाओं की संगत से बिगड़ी जेब की रंगत

यह तो सभी चाहते हैं कि उनके आफिस में सुंदर महिलाएं काम करें, लेकिन जिन आफिसों में ऐसा पहले से ही है, जरा वहां के बारे में पता कर लीजिए। दफ्तरों में महिला कर्मचारियों की बढ़ती संख्या का खामियाजा बेचारे पुरुष कर्मियों को भुगतना पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि इसके कारण उनकी नौकरी को कोई खतरा पैदा हो रहा है। दरअसल, इस वजह से उन्हें सज-संवर कर आफिस आना पड़ता है। जाहिर है महंगाई से लड़-झगड़ कर होने वाली बचत सौंदर्य प्रसाधनों पर खर्च हो रहीहै।

पुरुष कर्मियों का खर्च बढ़ाने में कार्पोरेट जगत का सघन प्रचार अभियान भी अहम भूमिका निभा रहा है। इसके चलते वह अपनी साज-सज्जा के प्रति ज्यादा सजग हो गए हैं तथा कास्मेटिक्स, वेशभूषा और मोबाइल फोन के मद में बेतहाशा खर्च कर रहे हैं। इसका खुलासा देश के प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम द्वारा कराए गए देशव्यापी सर्वेक्षण में हुआ है। इसके अनुसार 58 प्रतिशत युवा एवं मध्य आयु के लोग और उनकी 65 फीसदी संतानें इन वस्तुओं पर प्रत्येक माह 2500 रुपए से भी अधिक खर्च कर रही हैं। वर्ष 2000 में इन मदों में किया जाने वाला खर्च एक हजार रुपए प्रति माह ही था।

सर्वे में शामिल पांच हजार से अधिक उपभोक्ताओं में से 65 फीसदी ने कहा कि पिछले सात वर्षो के दौरान ब्रांडेड कास्मेटिक्स के मद में उनके खर्च 30 फीसदी बढ़े हैं। ऊपरी मध्य आयु (40 से 45 साल) के 57 फीसदी लोगों ने कहा कि पढ़ने और संजने-संवरने के मामले में वे पहले की अपेक्षा 22 फीसदी अधिक खर्च कर रहे हैं। कास्मेटिक्स पर खर्च के मामले में छात्र भी पीछे नहीं हैं। आखिर उनके कालेजों तो लड़कियां भी तो पढ़ती हैं। एसोचैम के मुताबिक 32 फीसदी छात्र इस मद में 700 से 1000 रुपए प्रति माह खर्च करते हैं। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 61 फीसदी लोगों ने बताया कि वे मोबाइल फोन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कार्यस्थलों पर ही करते हैं।

एसोचैम के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत ने बताया कि रोचक बात यह है कि महिला कर्मियों की तुलना में पुरुष सहकर्मियों में कास्मेटिक्स के प्रति रुझान बढ़ा है। उन्होंने कहा कि पुरुष उपभोक्ता प्रति माह कास्मेटिक्स पर 300 से लेकर 500 रुपए खर्च करते हैं और ब्रांड वगैरह के बारे में खुद निर्णय लेते हैं। इनमें से 85 प्रतिशत गुणवत्ता को विशेष तवज्जो देते हैं। दूसरी ओर 75 प्रतिशत महिलाएं ब्रांड का चुनाव खुद करती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 75 फीसदी पुरुष उपभोक्ता बार-बार अपना मोबाइल हैंडसेट बदलते रहते हैं और इस मद में उनके खर्च महिला सहकर्मियों की तुलना में ज्यादा हैं। जागरण डॉट कॉम से साभार

June 15, 2007

वेब पत्रकारिता का बढ़ता मायाजाल


राष्‍ट्रीय पाठक सर्वे 2002 में यह पाया गया था कि भारत में आम आदमी एक अखबार को पढ़ने के लिए मुश्किल से 32 मिनट खर्च करता है, जबकि टेलीविजन देखने के लिए सौ मिनट। युवा पीढ़ी की बात की जाए तो वे अखबार पढ़ने के लिए बेहद कम समय खर्च करते हैं, जबकि टेलीविजन देखने और इंटरनेट सर्फिंग के साथ अधिक समय बिताना पसंद करते हैं। असल में यह स्थिति भारत की नहीं, विदेशों की भी यही है। कंप्‍यूटरों की बढ़ती संख्‍या और ब्राड बैंड के फैलाव से युवा पीढ़ी तो अब टेलीविजन के बजाय इंटरनेट पर अपने दूसरे कार्य मसलन कोई खोज, ईमेल, चैट, पढ़ाई करते हुए समाचारों, विचारों और सूचनाओं के लिए अपने को अपडेट रखने के लिए वेबसाइटों पर ही जाना पसंद करती है।

इंटरनेट के फैलाव के शुरूआती दौर में प्रिंट, ब्राडकॉस्‍ट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम के बाद आई वेब पत्रकारिता के भविष्‍य पर ज्‍यादातर विश्‍लेषकों ने जल्‍दबाजी में टिप्‍पणी की थी कि यह लंबे समय तक नहीं टिक पाएगी लेकिन पिछले दस साल से इसका भारत में मायाजाल बढ़ता जा रहा है। हालांकि, वेब पत्रकारिता के शुरूआती समय में इतने उतार चढ़ाव आए कि इसकी स्थिति डांवाडोल होती दिखी, लेकिन एक बात स्‍वीकार करनी होगी कि दस साल तकनीक आधारित किसी नई चीज के लिए पर्याप्‍त नहीं होते। प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन न्‍यूज चैनलों को आज कई साल हो गए, इसलिए ये हमें जमे जमाए लगते हैं, जबकि वेब पत्रकारिता तो अभी शिशु ही है और इसे युवा बनने में समय लगेगा। लेकिन यहां मैं एक बात साफ कर दूं कि वेब समाचार देखने वाले समाचार पत्र पढ़ने वालों की तुलना में अधिक समृद्ध, अधिक अनुभवी और बेहतर शिक्षित एवं जवान हैं।

समूची दुनिया में इंटरनेट उपभोक्‍ताओं की साल दर साल बढ़ती संख्‍या से वेब के माध्‍यम से समाचार और सूचनाएं जानने वालों की संख्‍या और उनके ट्रैफिक में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। वेबसाइटों में समाचार देखने के अलावा ऑडियो और विजुअल का भी बेहतर उपयोग किया जा रहा है, जो रेडियो और टेलीविजन की कमी को भी दूर करता है। एक माध्‍यम में तीनों माध्‍यम प्रिंट, रेडियो और टेलीविजन का आनंद लिया जा सकता है।

भारत में वेब पत्रकारिता के इतिहास की बात करें तो यह लगभग दस वर्ष पुरानी है। देश में सबसे पहले चेन्‍नई स्थित हिंदू अखबार अपना पहला इंटरनेट संस्‍करण जारी करने वाला समाचार पत्र बना। हिंदू का इंटरनेट संस्‍करण 1995 में आया था। इसके बाद 1998 तक तकरीबन 48 समाचार पत्रों ने अपने इंटरनेट संस्‍करण लांच किए, लेकिन मौजूदा समय में देखें तो लगभग सभी मुख्‍य समाचार पत्रों, समाचार पत्रिकाओं और टेलीविजन चैनलों के नेट संस्‍करण मौजूद हैं। हालांकि, समाचार पत्र और पत्रिकाएं ऑन लाइन न्‍यूज डिलीवरी के खेल में पूरी तरह नहीं छा पाए हैं। बल्कि इन्हें न्‍यूज पोर्टल, न्‍यूज कॉनग्रेटर्स और इंटरनेट कंपनियां जैसे कि एमएसएन, याहू और गुगल का साथ लेना पड़ा है।

वेब पत्रकारिता में इस समय हम बात करें तो जिन अखबारों की वेबसाइट हैं वे ज्‍यादातर वही सामग्री उपयोग में ले रही हैं जो उनके समाचार पत्र में छपता है। चौबीस घंटे समाचारों, विचारों और सूचनाओं को अपडेट करने वालों की संख्‍या काफी कम है और जो अखबार दिन में अपडेशन करते हैं, उनमें समाचारों की संख्‍या कम होती है। या फिर इनमें विशेष स्‍टोरी के बजाय समाचार एजेंसियों से मिले समाचार होते हैं। अधिकतर अखबारों की वेबसाइटों में शायद इस डर से खास समाचारा नहीं डाले जाते होंगे कि कहीं उनके प्रतिस्‍पर्धी समाचार पत्रों के हाथ बेहतर स्‍टोरी न लग जाए या वे भी उन्‍हीं समाचारों को नए रंग रुप में विकसित न कर लें। ये समाचार पत्र मुशिकल से ही अपने इंटरनेट संस्‍करण्‍ा के लिए कुछ नए समाचार, फीचर और फोटोग्राफ तैयार करते हैं। अनेक वेबसाइटों में समाचार, फीचर और सूचनाएं नियमित रुप से अपडेट नहीं होती या काफी देर से होती है। औसत तौर पर देखें तो भी तकरीबन 60 फीसदी सामग्री वेब संस्‍करण में प्रिंट से उठाया हुआ ही होता है। लेकिन कुछ अखबारों ने अब इस निर्भरता को तोड़ने का कार्य शुरू कर दिया है और वेबसाइट एवं प्रिंट संस्‍करण के लिए अलग अलग तरीके से समाचार, फीचर और सूचनाएं तैयार कर रहे हैं। इसकी अगुआई टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने की। वेब पत्रकारिता में अब ई पेपर का आगमन हुआ है और यह एक प्रकाशन के वेब संस्‍करण से पूरी तरह अलग है। ई पेपर एक प्रिंट संस्‍करण जैसा ही दिखता है।

अखबारों के वेब संस्‍करण के संपादकीय विभाग की बात करें तो इंटरनेट संस्‍करण में जब ज्‍यादातर सामग्री प्रिंट से ले ली जाती है तो वहां स्‍टॉफ काफी कम रहता है। लेकिन कुछ मुख्‍यधारओं के समाचार पत्रों मसलन टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने अपने ऑनलाइन पेपर की अलग अवधारणा की और उसे प्रिंट संस्‍करण से अलग रखा। इसी तरह हिंदी में वेब दुनिया, प्रभासाक्षी, बीबीसी हिंदी वेबसाइट इसके बेहतर उदाहरण हैं जिनका प्रिंट संस्‍करण से लेना देना नहीं है। जागरण अखबार भी अब याहू के साथ नया पोर्टल लांच करने की तैयारी कर रहा है जो उसके प्रिंट संस्‍करण से अलग होगा। हिंदी में जागरण, प्रभासाक्षी, वेब दुनिया और बीबीसी हिंदी का बोलबाला है। हालांकि, अब समाचार, फीचर अपडेशन में कुछ और वेबसाइट आ रही हैं जो स्‍वतंत्र रुप से वेब आधारित हैं और इनमें स्‍टॉफ भी पर्याप्‍त रखा जा रहा है। समाचार पत्रों में अपने इंटरनेट संस्‍करण के लिए दो या चार लोगों की ही टीम रखी जाती है जो इस नई पत्रकारिता के लिए उचित नहीं है। लेकिन जो संस्‍‍थान पूरी तरह वेब पत्रकारिता में ही हैं, उन्‍होंने कई जगह अपने संवाददाता रखे हैं और बेहतर लेखकों की सेवाएं ले रहे हैं, हालांकि जिस तरह वेब पत्रकारिता का विस्‍तार हो रहा है, उस अनुरुप नए रोजगार के अवसर खड़े नहीं हुए हैं जिसके लिए अभी भी कुछ साल इंतजार करना पड़ेगा।

वेब पत्रकारिता ने पत्रकारिता में बड़ा परिवर्तन किया है। नई तकनीक के आने से वेब पत्रकारिता ने तत्‍काल की एक संस्‍कृति को जन्‍म दिया है। यह एक न्‍यूज एजेंसी या चौबीस घंटे टीवी चैनल जैसी है। तकनीक में हो रहे परिवर्तन ने वेब पत्रकारिता को जोरदार गति दी है। एक वेब पत्रकार जब चाहे वेबसाइट को अपडेट कर सकता है। यहां एक व्‍यक्ति भी सारा काम कर सकता है। प्रिंट में अखबार चौबीस घंटे में एक बार प्रकाशित होगा और टीवी में न्‍यूज का एक रोल चलता रहता है जो अधिकतर रिकॉर्ड होता है जबकि वेब में आप हर सैंकेड नई और ताजा समाचार और सूचनाएं दे सकते हैं जो दूसरे किसी भी माध्‍यम में संभव नहीं है।

मुझे कुछ समाचार बेवसाइटों में मुलाकात करने का मौका मिला है और मैंने वहां देखा कि एक या दो लोग पूरी वेबसाइट चला रहे हैं। इनमें वे लोग जुड़े हुए हैं जो वेब पत्रकारिता में पूरी तरह रम गए हैं और खोज खोजकर समाचारों और फीचरों को अपडेट कर रहे हैं। संपादकीय विभाग के विज्ञापन और मार्केटिंग विभाग में भी लोगों को रोजगार मिल रहा है लेकिन इनमें भी मौजूदा अखबार वाले उसी स्टॉफ का सहारा ले रहे हैं जो उनके अखबारों के लिए विज्ञापन बटोरने या मार्केटिंग का कार्य कर रहे है। लेकिन वेब पूरी तरह अलग तरह का उद्यम मानकर नियुक्तियां करनी होगी तभी इनके विस्‍तार और आय में इजाफा होगा। इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और मानव संसाधन पर बड़ा निवेश करे बगैर इंटरनेट संस्‍करण तैयार किए जा रहे हैं। इसकी एक मुख्‍य वजह इन संस्‍करणों के लाभ में न चलना है लेकिन अब चीजें बदल रही हैं। और कुछ दूसरे उत्‍पादों, सेवाओं और दूसरी वेबसाइटों के साथ गठबंधन कर आय को बढ़ाया जा रहा है, जिससे लाभ मिलने लगा है।

वेब पत्रकारिता का स्‍वाद और संस्‍कृति प्रिंट पत्रकारिता से अलग ढंग का है। एक वेबसाइट में स्‍थानिक और लौकिक प्रतिरोधक कम होते हैं और ताजा व पुरानी सूचनाएं एक साथ ढूंढी जा सकती है। यानी ऐसी सूचनाएं एक साथ आर्काइवि में मिल सकती है। सूचनाओं को जुटाना, उन्‍हें तैयार करना और प्रसार करना नेट पर ज्‍यादा सरल है। एक न्‍यूज वेबसाइट चलाना एक समाचार पत्र को प्रकाशित करने या एक टीवी चैनल चलाने से ज्‍यादा सस्‍ता और सरल है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकडों पर भरोसा करें तो तो वर्ष 2006 में 390 लाख इंटरनेट उपभोक्‍ता थे जिनकी संख्‍या वर्ष 2007 में बढ़कर एक हजार लाख होने की उम्‍मीद है। साथ ही नेट कनेकटिवीटी में हो रहे सुधार से वेब पत्रकारिता का भविष्‍य बेहतर बनता जा रहा है। यदि हम खोजी पत्रकारिता की भी बात करें तो वेब पत्रकारिता का भी इसमें अच्‍छा योगदान रहा है और किया भी जा रहा है। इसके बेहतर उदारहण तहलका डॉट कॉम और कोबरा डॉट कॉम रहे हैं। कुछ समाचार वेबसाइटों ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए दूसरे स्‍थापित मीडिया संगठनों के साथ गठबंधन किया है। केंद्र सरकार और विभिन्‍न राज्‍य सरकारों के सभी विभागों ने भी सूचनाएं देने के लिए वेबसाइटों का सहारा लिया है हालांकि अनेक सरकारी वेबसाइटों में सूचनाएं समय पर अपडेशन नहीं होती और इनका रखरखाव भी ठीक ढंग से नहीं होता लेकिन पत्रकारों द्धारा सरकार से सूचनाएं नेट के माध्‍यम से जिस तरह मांगी जा रही है उसमें इन सरकारी वेबसाइटों पर अपने कामकाज को सही तरीके से करने का दबाव बढ़ता जा रहा है जो बेहतर है।

वेब पत्रकारिता का एक रुप सिटीजन पत्रकारिता भी है। वेब पत्रकारिता आम आदमी को सूचनाएं, समाचार और अपने विचार दुनिया के सामने रखने का अवसर देती है। कोई भी व्‍यक्ति अपनी वेबसाइट और अब तो ब्‍लॉग बनाकर अपने पास आने वाली सूचनाओं, समाचारों और विचारों को सभी के सामने रख सकता है और यही सिटीजन पत्रकारिता कहलाती है। इस तरह की पत्रकारिता में आप और आपके पाठकों के बीच कोई नहीं होता। सिटीजन पत्रकारिता के तहत समाचार वेबसाइटें आम लोगों से भी समाचार और विचार मंगा सकती हैं। अनेक ई ग्रुप भी समाचारों और विचारों को अपने समूह में लेनदेन करते हैं।

देश में तेजी से बढ़ रहा कंप्‍यूटरीकरण और ब्राड बैंड सेवा वेब पत्रकारिता के विस्‍तार को बढ़ा रहा है। अब इसमें एक और परिवर्तन देखने को मिला है और वह है मोबाइल सेवाओं का विस्‍तार। डेस्‍क टॉप या लैपटॉप न होने की दिशा में मोबाइल पर वेबसाइट खोलकर समाचारों और सूचनाओं को जाना जा सकता है। हालांकि, देश में बिजली की कमी, कंप्‍यूटर की लागत और ब्राड बैंड सेवा/इंटरनेट उपयोग का महंगा शुल्‍क वेब के विस्‍तार में मुख्‍य अड़चन है, लेकिन देश को आर्थिक महासत्‍ता बनाने के लिए बुनियादी सुविधाओं जिसमें बिजली भी शामिल है, को तेजी से बढ़ाया जा रहा है। उम्‍मीद की जा सकती है कि आने वाले कुछ वर्षों में बिजली की कमी पूरी तरह दूर हो जाएगी। साथ ही ब्राड बैंड सेवा अपने विस्‍तार के साथ सस्‍ती होती जाएगी। इसी तरह कंप्‍यूटरों की लागत को भी पिछले कुछ वर्षों में वाकई कम किया गया है और आज एक लैपटॉप, डेस्‍कटॉप से सस्‍ता हो गया है। लेकिन अभी इसके दाम और नीचे लाने की जरुरत है जिसके प्रयास चल रहे हैं। इन तीन पहलूओं पर यदि तेजी से काम होता है तो समाचार और सूचनाओं का अगला सबसे ताकतवर माध्‍यम वेब पत्रकारिता ही होगा, इसमें अचरज नहीं है। प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक माध्‍यम की तुलना में वेब पत्रकारिता बाल्‍यवस्‍था से गुजर रही है, इसे युवा बनने दीजिए फिर यह भी तेजी से दौड़ेगी। आइए स्‍वागत करें वेब पत्रकारिता का।

मीडिया विमर्श का पूरा अंक पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिए : http://www.mediavimarsh.com/

May 20, 2007

विश्‍व युद्ध हिंदी ब्‍लॉगरों का

टेलीविजन चैनलों पर आजकल दो कार्यक्रम आ रहे हैं संगीत का प्रथम विश्‍वयद्ध और दूसरा है वॉयस ऑफ इंडिया...दोनों कार्यक्रमों में जमकर संगीत के नए खिलाडि़यों की परीक्षा ली जा रही है और उन्‍हें फिल्‍मो में गाने का मौका दिया जाएगा यदि अंतिम परीक्षा पास कर जाते हैं तो। हम भी चाहते हैं कि कुछ ऐसी ही प्रतियोगिता हिंदी ब्‍लॉगरों के बीच होनी चाहिए जो अलग अलग विषयों पर बेहतर लिखते हों। इनका चयन हिंदी के उम्‍दा लेखकों द्धारा होना चाहिए। सभी ब्‍लॉगर मित्र इस बहस को आगे बढ़ाए कि कैसे यह कार्य हो। चुने गए ब्‍लॉगरों को एक ऐसी वेबसाइट पर साल भर लिखने का मौका मिले, जो हर साल चुने गए बेहतर ब्‍लॉगरों के लिए ही बनी हो। हालांकि यह काम नारद पर बढि़या तरीके से हो सकता है जिसमें बेहतर ब्‍लॉगरों के लेखन के लिए कोई अलग से जगह तय कर दी जाए कि वहां केवल उन्‍हीं की पोस्‍ट होगी। इस कार्यक्रम की कसरत के लिए प्रायोजक से लेकर व्‍यक्तिगत धन योगदान देने वालों की खोज की जा सकती है और यह कठिन कार्य नहीं है। व्‍यक्तिगत योगदान मेरा भी होगा...यह तय है। भाई संजय बेंगानी जी, शशि जी, जीतू जी, मिर्ची सेठ जी, समीर जी उड़न तश्‍तरी, रवि रतलामी जी, फुरसतिया जी, सृजनशिल्‍पी जी, अमिताभ जी, रवीश जी, धुरविरोधी जी, भाटिया जी, ज्ञानदत्‍त पांडेय जी सहित सभी दिग्‍गज जिनके नाम मैं नहीं जानता हूं या इस सूची में छूट गए हैं, वे भी अपने को इस सूची में शामिल कर लें, नाराज न हो.....आप इस बारे में विचार करें और शुरु करे प्रथम विश्‍व युद्ध हिंदी ब्‍लॉगरों का। इस विश्‍व युद्ध में नारद की पूरी टीम के अलावा गुगल, याहू और एमएसएन जैसे सर्च इंजनों में बैठे हिंदी प्रेमियों को भी आमंत्रित किया जाए और जमाया जाए रंग।

May 13, 2007

धंधा खोलो धर्म का


संत आसाराम बापू ट्रस्‍ट का एक मामला हाल में ‘इंडिया टीवी’ पर दिखाया गया जिसमें बताया कि कैसे-कैसे इस संत ने कई जगह करोड़ों रुपए की जमीन फोकट में हड़प ली है और खुद भू माफिया बन गए हैं। मुझे भी कई पत्रकार और गैर पत्रकार मित्रों के फोन आए कि यार इस कलम खिसाई से तो अच्‍छा है संत बन जाएं और मौज करें। मेरा कहना है कि संत क्‍यों बनें, क्‍यों नहीं एक धार्मिक चैनल ही मिलकर खोल लें और ढ़ेर सारा रुपया बनाएं। ‘सहारा समय’ हिंदी साप्‍ताहि‍क में 17 जनवरी 2004 को मेरा एक लेख इसी मसले पर छपा था जिसे जस का तस ब्‍लॉग पर दे रहा हूं।

लेख का शीर्षक था ‘चैनलों की चांदी...’ आप भी पढि़ए...पिछले तीन साल में भारत में धार्मिक चैनल के दर्शकों की संख्‍या में अच्‍छा खासा इजाफा हुआ है। इसे देखते हुए पांच और नए धार्मिक चैनलों के आने की तैयारी हो रही है। धार्मिक चैनलों पर अलग अलग संतों के प्रवचनों का खूब प्रसारण होता है जिनमें मुख्‍य रुप से यह बात होती है कि भगवान कौन है और पैसा मिट्टी है। प्रवचनों का सार यह होता है कि सब कुछ गुरु के चरणों में समर्पित कर दो।

संतों के सेवक अपने गुरु के ऑडियो-वीडियो टेप तैयार करते हैं और टीवी चैनलों से सौदा तय करते हैं। इसी तरह अलग अलग शहरों में प्रवचनों के आयोजक रहते हैं जो इन गुरुओं के प्रवचन धार्मिक टीवी चैनलों पर प्रसारित कराकर धन लेते हैं। ये प्रवचन पहले से रिकॉर्ड किए हुए भी हो सकते हैं और कई बार इनका सीधा प्रसारण भी कराया जाता है। इन प्रसारणों का लाभ यह होता है कि प्रवचन सुनने वाले भारी संख्‍या में आते हैं और पंडाल हमेशा भरे रहते हैं। आसाराम बापू अपने प्रवचनों का आयोजन खुद करते हैं। अब अन्‍य गुरु भी उनकी राह पर हैं। बड़े संतों के प्रवचन के कार्यक्रम तीन-तीन साल तक के लिए तय रहते हैं। आसाराम बापू के आश्रम की निगरानी रखने वाले अजय शाह बताते हैं कि सत्‍तर के दशक में आसाराम बापू को केवल गुजरात, मध्‍य प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश के कुछ हिस्‍सों में ही जाना जाता था लेकिन 1992 में उन्‍हें अपने प्रवचनों के प्रसारण के लिए सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर सुबह का समय मिला और उनका नाम घर-घर जाना जाने लगा।

नब्‍बे के दशक में सोनी और जी टीवी ने सुबह के समय प्रवचन का प्रसारण शुरू किया और इससे ही धर्म के धंधे में मौजूदा बदलाव आया। लेकिन इस सारे कारोबार को व्‍यवस्थित तौर पर तीन साल पहले आए ‘आस्‍था’ चैनल ने आगे बढ़ाया। देश का यह पहला चैनल है जो धार्मिक प्रवृति वाले लोगों के लिए था। इसके बाद ‘संस्‍कार’ चैनल आया और पिछले साल तीसरा ‘साधना’ चैनल आया। अब ‘जागरण’, ‘शक्ति’, ‘अहिंसा’, ‘संस्‍कृति’ और ‘सुदर्शन’ नाम के चैनल आने की तैयारी कर रहे हैं। इन चैनलों ने नए गुरुओं की कमाई की राह को आसान बनाया है। ‘साधना’ के राकेश गुप्‍ता कहते हैं कि ‘टीवी के आने से गुरुओं को अपनी इमेज खड़ी करने में बड़ी मदद मिली है। अब लोग उन्‍हें खूब जानने लगे हैं और प्रवचन आयोजक भी ज्‍यादा पैसे देने को तैयार हैं।‘

हालांकि कोई भी यह मानने को तैयार नहीं है कि वे धर्म का धंधा कर रहे हैं और माया कमा रहे हैं। ‘आस्‍था’ के मार्केटिंग प्रमुख कमल भक्‍तानी और ‘संस्‍कार’ के दिनेश काबरा धन की बात से इनकार करते हैं। राकेश गुप्‍ता कहते हैं कि उन्‍होंने टीवी चैनल इसलिए किए कि दूसरे दो चैनलों का व्‍यापारीकरण हो चुका था और वे एयर टाइम के लिए धन ले रहे थे। वे कहते हैं, कि ‘केवल हमारा चैनल ही नॉन प्राफिट संगठन है।‘

धार्मिक टीवी चैनलों पर प्राइम टाइम सुबह सात से नौ बजे तक का होता है और इस दौरान बीस मिनट के प्रवचन के लिए ‘आस्‍था’ और ‘संस्‍कार’ चैनल छह से दस हजार रुपए लेते हैं। नॉन प्राइम टाइम में यह दर लगभग तीन से साढ़े तीन हजार रुपए रहती है। सप्‍ताहांत में दर्शकों की संख्‍या बढ़ जाने से दरें भी बढ़ जाती है और 20 मिनट के लिए 12 हजार से 15 हजार रुपए लिए जाते हैं। ‘साधना’ की दरें कम हैं।

ईसाई मत का प्रसार करने करने वाले चैनल ‘गॉड टीवी’ और ‘जीवन’ हिंदू धार्मिक चैनलों की तरह ही काम कर रहे हैं। ‘गॉड टीवी’ को ब्रिटेन स्थित एंगल फाउंडेशन चलाता है। इस चैनल की आय में 40 फीसदी हिस्‍सेदारी विभिन्‍न चर्चों के कार्यक्रम प्रसारण की है जबकि शेष दान से आती है। दूसरे चैनल ‘जीवन’ को भारत के कैथोलिक चर्च ने प्रमोट किया है जिसका दावा है कि वह नैतिक मूल्‍यों के महत्‍व को समझाते हुए पारिवारिक कार्यक्रम प्रसारित करता है।

धार्मिक चैनलों के लिए प्रवचन और भजनों का प्रसारण मुनाफे का कारोबार है। ‘आस्‍था’ की शुरूआत तीन करोड़ रुपए के मामूली निवेश से हुई थी। प्रसारण उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि ऐसे चैनल लांच करना काफी आसान है और दस करोड़ रुपए के बजट में इसकी शुरूआत की जा सकती है। इन चैनलों को चलाने की लागत भी काफी कम बैठती है। ‘आस्‍था’ हर महीने सैटेलाइट के किराए के रुप में छह से सात लाख रुपए अदा करता है। सिंगापुर में ट्रांसमिशन स्‍टेशन चलाने के लिए पांच से छह लाख रुपए देने होते हैं। कर्मचारियों, कार्यालय और स्‍टूडियो पर 15/20 लाख रुपए की लागत बैठती है। इस तरह एक महीने में चैनल का खर्च 30/35 लाख रुपए आता है। इस खर्च के मुकाबले यह चैनल केवल गुरुओं के सहारे हर महीने 50 लाख रुपए कमा लेता है। चैनल की आय में गुरुओं का योगदान 60/70 फीसदी रहता है। विज्ञापन से केवल 20 फीसदी आय होती है। शेष आमदनी भजन एलबम आदि को प्रमोट करने, धार्मिक गतिविधियों को कवर करने और धार्मिक ट्रस्‍टों के प्रोफाइलिंग कारोबार से आती है।

धार्मिक टीवी चैनलों में आम नियम यह है कि छोटे गुरु को बड़े गुरु से ज्‍यादा पैसा अदा करना होता है। यह नियम लिखित नहीं है। इसका गणित इस पर निर्भर है कि छोटे गुरु के प्रवचनों में कितना दम है। अगर वह चैनल के प्रबंधन को जानता हो तो उसे कम पैसा देना पड़ता है। ‘आस्‍था’ चैनल के बीस मिनट के स्‍लॉट में गुरु को तीन मिनट अतिरिक्‍त मिलते हैं। गुरु चाहे तो इस समय को बेचकर विज्ञापनकर्ता से पैसा ले सकता है या फिर अपने उत्‍पादों को प्रमोट करने के लिए इसका उपयोग कर सकता है। मार्केटिंग के जानकार बताते हैं कि गुरुओं ने अपने प्रवचन के प्रायोजक ढूंढकर आय का नया स्‍त्रोत विकसित कर लिया है। ज्‍यादातर गुरु तीनों धार्मिक चैनलों पर आते हैं। लेकिन वे इस बात का खास ख्‍याल रखते हैं कि दो चैनलों पर एक साथ उनका कोई प्रवचन या कार्यक्रम प्रसारित न हो। लाइव प्रसारण के समय उनके सेवक प्रवचनों की रिकॉर्डिंग करते हैं और 20/20 मिनट के कैसेट खुद संपादित कर टीवी चैनलों को सौंपते हैं।

May 11, 2007

सुविधाभोगी संपादकों ने किया है पत्रकारिता का बेड़ा गर्क

शक्तिमान राम को कुशलता के साथ केंवट ने जिस तरह नदी के पार उतारा, वहीं भूमिका मीडिया में एक संपादक की होती है। यहां शक्तिमान समाज है और उसके लिए केवट की भूमिका संपादक को निभानी होती है। लेकिन अब बदले माहौल में संपादकों ने केंवट की भूमिका छोड़ दी है और समाज की बजाय मीडिया मालिकों के हितों के लिए ज्यादा काम कर रहे हैं। पढि़ए मेरा यह पूरा लेख मीडिया विमर्श पत्रिका के इस लिंक पर http://www.mediavimarsh.com/march-may07/kamalsharma.march-may07.htm