September 7, 2007

बवासीरियों, बांझों और कुंआरों का हिंदुस्‍तान

मध्‍य प्रदेश में इंदौर से प्रकाशित अखबार नई दुनिया में संपादक के नाम पत्र में एक खत छपा है जिसे लिखा है विजय चितले ने। इसका शीर्षक है ईश्‍वर का अस्तित्‍व। आप भी पढि़ए इस पत्र को तो आप इस पोस्‍ट के शीर्षक से सहमत होते नजर आएंगे कि क्‍या हिंदुस्‍तान बवा‍सीरियों, बांझों और कुंआरों का देश है।

यदि कोई विदेशी पर्यटक भारत की राजधानी में कदम रखने के बाद रेल से सफर कर भारत दर्शन और भारत की खोज करने की कोशिश करे तो चंद दिनों में उसे ऐसा लगने लगेगा कि :
1. रेलवे लाइन के दोनों और दिवारों पर जो इश्तिहार हैं उससे ऐसा लगता है कि यहां के अधिकतर लोग या तो पाइल्‍स/बवासीर से पीडि़त हैं, उन्‍हें यौन समस्‍याएं हैं, यहां बांझपन बहुत है या शादी के रिश्‍ते एक बड़ी समस्‍या है।
2.रेलगाड़ी के टॉयलेट्स (विशेषत: द्धितीय श्रेणी के) में वो जो भीत्ति चित्र या ग्राफिक्‍स देखेगा उससे उसे हमारे चित्रकला और साहित्‍य प्रेम की एक यूनिक झलक मिलेगी जो इतनी ज्‍यादा मानवी शारीरिक संबंधों पर आधारित है।
3. रेलवे के दोनों बाजू की झोपड़पट्टियां, खुले में मार्निंग डयूटीज करते लोग बाग, जहां तहां पालीथीन के ढेर, सुअर आदि देखकर उसे अचंभा होगा।
4. जगह जगह पा यानी रेलवे के पादचारी पूल पर, वेटिंग रुम की दिवारों पर, संडास में आदि थूके हुए पान के गीले दाग देखकर वो अज्ञानी आगंतुक समझेगा कि यहां खून की उल्टियों का प्रादुर्भाव बहुत है।
5. पर इतना सब होते हुए भी ये देश चल रहा है। यह देखकर उसका ईश्‍वर के अस्तित्‍व पर दृढ़ विश्‍वास हो जाएगा और एक धार्मिक इंसान बन वह अपने देश वापस चला जाएगा।

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

सत्यवचन। हम तो इतने में ही आस्तिक हो गये।

satyendra... said...

सही कहा आपने,संपादक के नाम पत्र िलखने वाले का दर्द जायज है।लगता है कि यही सब देखकर ये विदेशी काशी की गलियों में छुट्टा सांड़ की तरह घूमते हैं।
सत्येन्द्र

अरुण said...

यही है मेरा भारत और उसकी जीवन शैली
हाथ मे है बोतल,करता हर दिवार मैली