इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस एस. एन. श्रीवास्तव ने रिटायर होने से 5 दिन पहले 30 अगस्त को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि राष्ट्रीय ध्वज , राष्ट्रगान , राष्ट्रीय पक्षी और राष्ट्रीय पुष्प के समान भगवद्गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र घोषित किया जाना चाहिए। उनके इस बयान पर बहस शुरू हो गई है। हालांकि जस्टिस एस . एन . श्रीवास्तव के फैसले पर अगले ही दिन डिवीजन बेंच ने रोक लगा दी और 4 सितंबर को वह रिटायर भी हो गए।जस्टिस श्रीवास्तव ने वाराणसी के गोपाल ठाकुर मंदिर के पुजारी श्यामल राजन मुखर्जी की याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि देश की आजादी के आंदोलन की प्रेरणास्रोत रही भगवद्गीता भारतीय जीवन पद्धति है। उन्होंने कहा कि इसलिए संविधान के अनुच्छेद 51( ए ) के तहत देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह इसके आदर्शों पर अमल करें और इस राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करें।
इससे पहले भी इस साल जस्टिस एस . एन . श्रीवास्तव अपने एक फैसले को लेकर सुर्खियों में रहे थे। उन्होंने फैसला दिया था कि उत्तर प्रदेश में चलने वाले मुस्लिम शिक्षण संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थानों को मिलने वाले लाभ नहीं मिलने चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि भगवद्गीता के उपदेश किसी खास संप्रदाय की नहीं है बल्कि सभी संप्रदायों की गाइडिंग फोर्स है। गीता के उपदेश बिना परिणाम की परवाह किए धर्म के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। यह भारत का धर्मशास्त्र है जिसे संप्रदायों के बीच जकड़ा नहीं जा सकता। जस्टिस श्रीवास्तव ने कहा कि संविधान के मूलकर्तव्यों के तहत राज्य का यह दायित्व है कि भगवद्गीता को राष्ट्रीय धर्मशास्त्र की मान्यता दे।
कोर्ट ने कहा कि भारत में जन्मे सभी संप्रदाय सिख , जैन , बौद्ध आदि हिंदुत्व का हिस्सा हैं। जो भी व्यक्ति ईसाई , पारसी , मुस्लिम , यहूदी नहीं है वह हिंदू हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दूसरे धर्मो के अनुयायियों की तरह हिंदुओं को भी अपने संप्रदायों का संरक्षण प्राप्त करने का हक है। नवभारत टाइम्स से साभार




3 comments:
जस्टिस एस. एन. श्रीवास्तव शुरू से विवादों में रहे हैं. यह हमारे देश का दुर्भाग्य हैं की न्यायपालिका में बेठे लोग भी पहले हिंदू या मुस्लिम होते हैं बाद में जज
श्रीवास्तव जी की एक बात तो बिल्कुल सही है कि भगवद्गीता को हिन्दू धर्म मात्र से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। गीता एक धार्मिक ग्रंथ से अधिक एक जीवन पद्धति है।
जिस तरह योग हिन्दुत्व से परे है, मार्शल आर्ट बुद्धिज्म से परे है उसी तरह गीता को भी धर्म की सीमाओँ में नहीं बांधा जाना चाहिए।
@आशीष,
आशीष भाई हर आदमी कुछ न कुछ पहले होता ही है, आप भी पहले नास्तिक हैं फिर कुछ और। वरना पूरे मामले पर समग्र विचार कर ही अपनी राय देते।
सही कहा कमल जी भगवद्गीता को धर्म मात्र से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वैसे भी हम भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश की उपाधि दे चुके हैं। ऐसे में इस तरह का फैसला कहीं से न्यायसंगत नहीं है। गीता तो एक ऐसी पुस्तक है जो सबके लिए काफी उपयोगी है। ऐसे में उसे किसी धर्म की सीमाओं में समेटना उचित नहीं है।
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